Tuesday, November 30, 2021
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OMG रोटी खाने से भी कैंसर का खतरा, लोगों के लिए नई किस्म के गेहूं की खेती कर रहे वैज्ञानिक

पढ़िये नवभारत टाइम्स की ये खास खबर….

भारत में कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। साल 2020 की नेशनल कैंसर रजिस्‍ट्री प्रोग्राम रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर के मौजूदा समय में 13.9 लाख मामले हैं और ये आंकड़ा 2025 तक 15.7 लाख तक पहुंच सकता है। इस रिपोर्ट में 2016 में 12.6 लाख मामले और 2019 में 13.6 लाख मामले का डेटा दिया गया है। यह अनुमान 2012 और 2016 के बीच हुए डेटा कलेक्‍शन पर आधारित हैं जिनमें कुछ अस्पतालों के आंकड़े भी शामिल हैं।

दुनिया भर में हार्ट अटैक की तरह कैंसर के मामलों में भी तेजी से वृद्धि हो रही है और इसे कम करने के लिए वैज्ञानिक कुछ चीजों पर प्रैक्टिकल कर रहे हैं। हाल ही में ब्रिटिश के वैज्ञानिकों ने कैंसर का जोखिम कम करने के लिए गेहूं की नई किस्म को इजाद किया है। वैज्ञानिकों ने जीन एडिटिंग तकनीक से गेहूं की नई प्रजाति का निर्माण किया जो कैंसर को रोकने में मदद कर सकते हैं।

​कैंसर को रोकने के लिए गेंहू की नई किस्म

कैंसर को रोकने के लिए वैज्ञानिकों ने जिस गेंहू की प्रजाति को विकसित किया है, उसमें से उन्होंने एसपर्जिन नाम के अमीनो एसिड की मात्रा को कम किया है। ये काम ब्रिटेन की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने किया है जो कि हर्टफोर्डशायर में गेहूं की जेनेटिकली मोडिफाइड (Genetically modified wheat) किस्म विकसित करने में लगे हुए हैं।

वैज्ञानिकों का यह प्रोजेक्ट 5 साल तक चलेगा। जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा पहली बार है कि जब जीन तकनीक के जरिए यूरोप में गेहूं की फसल को उगाया जा रहा है, हालांकि इस तकनीकि को चीन और अमेरिका काफी पहले आजामा चुके हैं।

​गेहूं का कैंसर से कनेक्शन?

शोधकर्ताओं के अनुसार, आमतौर पर जब हम सामान्य गेंहू को पकाते हैं तो इसमें मौजूद एसपर्जिन, कैंसर फैलाने वाले तत्व एक्रेलामाइड में परिवर्तित हो जाता है जो कि कैंसर का कारण बनता है। यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने गेंहू की नई प्रजाति विकसित करने के लिए एडिटिंग कर एसपर्जिन को हटाया है। पिछले साल ही अर्जेंटीना जेनेटिक मॉडिफाइड गेहूं को उगाने और उसकी खपत को मंजूरी देने वाला पहला देश बना था।

​एसपर्जिन के हटने से एंटीकैंसर बनेंगे गेंहू

ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता 1990 से जेनेटिकली मोडिफाई फसल के निर्माण में लगे हैं। शोधकर्ता निगेल हाफोर्ड का मानना है कि साल 2002 में एक्रेलामाइड की खोज हुई थी और इसे लेकर चूहे पर एक शोध हुआ था। रिसर्च में पता चला है कि एसपर्जिन फैलाने वाला एक्रेलामाइड कैंसर का कारण बनता है जो इंसानों में इस जानलेवा बीमारी के जोखिम को बढ़ाता है। गेहूं की नई फसल की क्वालिटी के स्तर पर कोई बदलाव नहीं आया है, इसमें से सिर्फ एसपर्जिन को रिमूव किया है।

साभार-नवभारत टाइम्स

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