Sunday, November 28, 2021
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अफगानिस्तान से पत्रकार की डायरी:‘मेरी सगी बहन तालिबान के कब्जे वाले इलाके में फंसी है, एक-दूसरे से बात कर रो लेने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है’

पढ़िये दैनिक भास्कर की ये खास खबर….

‘काबुल के बाहरी हिस्से में हालात ऐसे हैं कि यहां रोजाना पचासों कैंप बन रहे हैं। तालिबान के कब्जे वाले इलाकों से भागे प्रवासी यहां भारी तादाद में आ रहे हैं। लोग किसी तरह जान बचाकर यहां आ तो रहे हैं, लेकिन इन शेल्टर होम्स में न पीने लायक पानी है और न पर्याप्त खाने का सामान। कुल मिलाकर इन कैंपों में रहने लायक कुछ भी नहीं है, सिवा इस तसल्ली के कि फिलहाल यहां जिंदगी कुछ दिनों तक सुरक्षित है।’

ये काबुल के एक पत्रकार की डायरी का एक छोटा सा अंश है। ये लाइनें न किसी डायरी पर पेन से लिखी गई और न लैपटॉप या कम्प्यूटर पर। दैनिक भास्कर की रिपोर्टर ने काबुल में रहने वाले जर्नलिस्ट से लंबी बातचीत की और फिर उसे डायरी की शक्ल दी। ताकि हम अफगानिस्तान के मौजूदा हालात से रू-ब-रू हो सकें।

काबुल के इन जर्नलिस्ट का नाम हम नहीं छाप रहे हैं। इसकी एक अफसोसनाक वजह है। बीते सात अगस्त को दैनिक भास्कर के काबुल में एक सोर्स को तालिबान ने कत्ल कर दिया था।

अब विस्तार से पढ़िए, काबुल के पत्रकार की डायरी…

हिंदुकुश पहाड़ियों की खूबसूरत वादियों में बसा काबुल किसी किले जैसा एहसास देता है। चप्पे-चप्पे पर सैनिक तैनात हैं। बख्तरबंद गाड़ियां दौड़ती नजर आ रही हैं। उदासी लोगों के चेहरों पर तैर रही है क्योंकि लोगों को डर है कि देश के अधिकतर हिस्सों में चल रहा भीषण युद्ध कभी भी काबुल तक पहुंच सकता है।

समंदर से करीब 1800 मीटर ऊपर पहाड़ियों से घिरा ये शहर इस समय अफगानिस्तान का सबसे सुरक्षित हिस्सा है, लेकिन रह-रहकर यहां के आसमान में भी धुआं उठता रहता है और लोगों के मन में सवाल कौंध जाता है कि काबुल आखिर कब तक सुरक्षित रहेगा?

हिंदुकुश पहाड़ियों की वादी में बसे काबुल शहर के आसपास जंग अभी नहीं पहुंची है, लेकिन हेरात समेत कई प्रांत की राजधानियों के तालिबान के कब्जे में आने के बाद काबुल में खौफ पसरा हुआ है।

खाने-पीने की चीजों की कीमत हर दिन बढ़ रही है। ईंधन के दाम लगभग दोगुने हो गए हैं। लोग जरूरत के सामान इकट्ठा करने लगे हैं। लोगों को सबसे बड़ा डर ये है कि कहीं हालात फिर से 1980-90 के गृह युद्ध जैसे न हो जाएं। तालिबान के पिछले कट्‌टर शासन को याद कर लोग यहां सिहर जाते हैं।

सब काबुल की ओर भाग रहे हैं

तालिबान धीरे-धीरे अफगानिस्तान के बड़े हिस्से पर कब्जा कर रहा है। कुछ ही दिनों के भीतर उत्तरी हिस्से में स्थित कुंदूज और सर-ए-पोल जैसे प्रांत तालिबान के हाथों में आ चुके हैं। कुंदूज पर तालिबान का कब्जा इसलिए भी डराने वाला है क्योंकि यहां से तालिबानी लड़ाके काबुल का रुख कर सकते हैं।

काबुल शहर में इस समय चप्पे-चप्पे पर पुलिस और फौज तैनात है। बख्तरबंद गाड़ियां अक्सर गश्त लगाती नजर आ रही हैं।

इन सबका नतीजा यह है कि युद्धग्रस्त इलाकों से लोग भागकर काबुल पहुंच रहे हैं। अमेरिकी सेना की मौजूदगी के दौरान देश में काम करने वाली सरकारी एजेंसियों, एनजीओ और विदेशी संस्थानों के लोग काबुल लौट चुके हैं।

काबुल के बाहरी हिस्से में हालात यह हैं कि यहां रोजाना पचासों कैंप बन रहे हैं। तालिबान के कब्जों वाले इलाकों से भागे प्रवासी यहां रह रहे हैं। ये लोग जान बचाकर यहां भाग तो आए हैं, लेकिन इन शेल्टर होम्स में न पीने लायक पानी है और न पर्याप्त खाने का सामान। कुल मिलाकर इन कैंपों में रहने लायक कुछ भी नहीं है, सिवा इस तसल्ली के कि फिलहाल यहां जिंदगी कुछ दिनों तक सुरक्षित है।

हिंसा में बड़ी तादाद में आम नागरिक मारे जा रहे हैं। हमारे पास देश के अलग-अलग हिस्सों से आम लोगों के मारे जाने और युद्ध में हो रही बर्बादी की तस्वीरें आ रही हैं। आगे बढ़ते तालिबानी और उन्हें खदेड़ने की कोशिश करती सेना के वीडियो जब हम तक पहुंचते हैं तो दिल दहल जाता है।

तालिबान के लगातार बढ़ते कब्जे के कारण अफगानिस्तान के दूसरे हिस्सों के लोग काबुल की ओर रुख कर रहे हैं। काबुल के बाहरी हिस्से में प्रवासियों के कैंप ही कैंप नजर आते हैं।

35 हजार परिवार विस्थापित, 80 हजार से ज्यादा बच्चे बेघर

अब तक 80 हजार से अधिक बच्चे बेघर हो चुके हैं। ऐसा सेव द चिल्ड्रेन की रिपोर्ट बता रही है। असली संख्या इससे काफी ज्यादा भी हो सकती है। अफगानिस्तान की मानवाधिकार परिषद के मुताबिक इस समय देश के 25 प्रांतों में पैंतीस हजार से अधिक परिवार बीते एक महीने के भीतर ही विस्थापित हुए हैं। ऐसा लगता है कि काबुल में विस्थापितों का सैलाब आ गया हो।

अभी अफगानिस्तान में गर्मी का मौसम है जिसकी वजह से बेघर हुए लोगों को बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। खुले आसमान या कैंपों में गर्मी का सामना करना मुश्किल है। काबुल में लोड शेडिंग आम बात है। अभी के हालात में यह और बढ़ गई है। कई-कई घंटे बिजली नहीं आती है। यूपीएस हर समय बीप-बीप करता रहता है। यह आवाज बार-बार एहसास दिलाती है कि हम इमरजेंसी में हैं।

लोग विदेश भागने की फिराक में

यह काबुल के पासपोर्ट दफ्तर के सामने लगी भीड़ है। तालिबान से युद्ध की शुरुआत के बाद से ही साधन संपन्न लोग विदेश जाने की कोशिश कर रहे हैं।

जब से युद्ध छिड़ा है, लोग अफगानिस्तान से भागकर तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान जाने की कोशिश कर रहे हैं। अमेरिका और ब्रिटेन के ट्रांसलेटर्स और विदेशी सेनाओं के मददगारों को वीजा देने का ऐलान करने के बाद से लोग वीजा बनवाने की जद्दोजहद में जुटे हैं।

पासपोर्ट और वीजा दफ्तरों पर लंबी कतारें हैं, जिनमें हताश, उदास और डरे हुए चेहरे नजर आते हैं। लोग बीवी-बच्चों के साथ लाइनों में लगे हैं कि जल्द से जल्द देश छोड़कर किसी सुरक्षित ठिकाने पर पहुंच जाएं, लेकिन भीड़ इतनी है कि उन्हें दो-तीन महीने बाद आने को कहा जा रहा है।

वीजा बनवाने के लिए पासपोर्ट के अलावा बर्थ सर्टिफिकेट और निकाहनामों की भी जरूरत पड़ रही है। ये दस्तावेज बनवाना आसान नहीं है। लोग अपनी जान का खतरा उठाकर इन कामों के लिए घर से बाहर निकलते हैं और फिर मायूस लौटते हैं।

मेरा एक दोस्त जो अभी कुछ दिन पहले ही जापान से पढ़ाई करके लौटा था, वह अब फिर अपने परिवार को लेकर देश से बाहर जाना चाहता है। वो पहले किसी तरह उज्बेकिस्तान पहुंचेगा और फिर शायद वहां से जापान।

पड़ोसी देशों ने सीमाएं सील की

अधिकतर पड़ोसी देशों ने अफगानिस्तान के साथ अपनी सीमाओं को बंद कर दिया है। तजाकिस्तान और उज्बेकिस्तान वीजा न देने के बहाने बना रहे हैं। पाकिस्तान का वीजा भी बहुत मुश्किल से मिल रहा है। भारत अफगान लोगों को सिर्फ मेडिकल वीजा देता है।

तजाकिस्तान अब भी वीजा दे रहा है, लेकिन इसकी कीमत इतनी महंगी कर दी है कि आम लोग इसे चुका नहीं सकते हैं। ऐसे में एक तरह से अफगानिस्तान से बाहर निकलने के रास्ते बंद हो गए हैं।

तालिबान लोगों को बाहर नहीं निकलने दे रहा है

तालिबान ने हेरात, कुंदूज समेत कई महत्वपूर्ण शहरों पर कब्जा कर लिया है। कई इलाकों में भीषण लड़ाई चल रही है। तालिबान अपने कब्जे वाले इलाकों से लोगों को बाहर भी नहीं जाने दे रहा है।

तालिबान लोगों को आने-जाने नहीं दे रहे हैं। यदि बहुत जरूरी काम है, बीमारी की हालत है तो सिर्फ एक व्यक्ति को ही काम पूरा करने के लिए जाने दिया जा रहा है। इक्का-दुक्का लोग ही बमुश्किल बहाने बनाकर बाहर निकल पा रहे हैं, लेकिन पकड़े जाने पर जान का खतरा तो है ही।

काबुल समेत पूरे देश में काम-धंधे बंद हैं। लोगों के पास पैसे नहीं हैं। मेरे अपने कई रिश्तेदारों ने घर का खर्च चलाने के लिए मुझसे पैसे उधार लिए हैं क्योंकि उनकी आय के सभी दूसरे स्रोत बंद हो चुके हैं। पैसा न होने की वजह से बहुत से लोग सुरक्षित ठिकानों की तरफ भी नहीं जा पा रहे हैं।

कोई सेना की तरफ से लड़ रहा है, कोई तालिबान की तरफ से

मैं मूलरूप से पक्तिया प्रांत का रहने वाला हूं। यहां अब तालिबान का नियंत्रण है। मेरे कई अपने सेना की तरफ से लड़ रहे हैं तो कई तालिबान की तरफ हैं। मेरे कस्बे के कुछ लोग जो तालिबान के साथ थे, वो ड्रोन हमलों में या जंग के मैदान में मारे जा चुके हैं।

मेरी सगी बहन तालिबान के नियंत्रण वाले इलाके में फंसी हैं। उसके शौहर बॉर्डर पुलिस में थे, लेकिन तालिबान के आने के बाद उन्हें छुपना पड़ा है। हम न उनके पास जा सकते हैं और न वो हमारे पास काबुल आ सकते हैं। एक-दूसरे से बात करके रो लेने के अलावा कोई चारा नहीं है। बेबसी ऐसी है कि लफ्जों में नहीं लिखी जा सकती है।

उदासी और अवसाद में घिरे हैं जिंदादिल लोग

अफगान सैन्य बलों और तालिबान के बीच भीषण लड़ाई के चलते बड़े पैमाने पर आम लोगों के घरों को नुकसान पहुंचा है।

काबुल के लोग आमतौर पर जिंदादिल होते हैं। धमाकों की आवाज, गोलियों की तड़तड़ाहट से न तो वो डरते हैं और न ही थमते हैं। लंबे समय से युद्ध के हालात ने यह सब उनकी आदत में ला दिया है, लेकिन इन दिनों उदासी और अवसाद ने पूरे अफगानिस्तान को घेर रखा है।

पहले जब हम पत्रकार लोगों से बात करते थे तो हुजूम लग जाता था। अब बहुत कोशिश करने पर भी कोई कुछ नहीं बोलता। बस उदास चेहरे ही दिखते हैं। लोगों को डर है कि कहीं उनके बयान की वजह से उन्हें निशाना न बना लिया जाए।

इस समय काबुल में सिर्फ युद्ध की बातें हो रही हैं। लोग एक-दूसरे से पूछते हैं कि कौन से देश जाना आसान है, कैसे अफगानिस्तान को छोड़कर जाया जाए। यह उन लोगों के लिए है, जिनके पास साधन हैं। बाकी आम अफगानी ने मान लिया है कि जंग ही उनका मुकद्दर है।

अभी काबुल तक नहीं पहुंची है जंग

काबुल शहर के एक बाजार का नजारा। लोग युद्ध की आशंका को देखते हुए खाने-पीने का सामान इकट्‌ठा कर रहे हैं, जिससे इनकी कीमतें कई गुना बढ़ गई हैं।

अफगानिस्तान में इन दिनों शादियों का मौसम है। हामिद करजई नेशनल एयरपोर्ट के पास कई होटल हैं। इन होटलों में एक-एक दिन में तीन-तीन शादियां हो रही हैं। देश जंग में घिरा है, लेकिन लोग रस्मों में शरीक हो रहे हैं। युद्ध और अस्थिरता को लोगों ने किस्मत मान लिया है।

हालांकि काबुल अभी भी बहुत हद तक शांत ही है। यहां नया शहर जिसे शहर-ए-नाव कहते हैं वहां अब भी आपको कैफे में बैठे लोग मिलेंगे। एक गली में धमाका होता है तो दूसरी गली में लोग कैफे में बैठे, पार्टी करते नजर आते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि मानो कुछ हुआ ही न हो।

यूनिवर्सिटी में होने वाले दाखिलों के लिए उमड़ी भीड़

अफगानिस्तान में यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में दाखिले के लिए एक ही एंट्रेस एग्जाम होता है। देश का करीब 80% हिस्सा युद्ध की चपेट में है, लेकिन अभी जब ये एग्जाम हुआ तो बड़ी तादाद में स्टूडेंट ने हिस्सा लिया। स्टूडेंट का जोश के साथ इसमें हिस्सा लेना बताता है कि भले ही देश युद्ध में घिरा हो, लेकिन लोगों ने बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं छोड़ी है।

पाकिस्तान तालिबान की मदद कर रहा है

तालिबान के खिलाफ इस बार आम अफगानी में एकजुटता भी दिखाई दे रही है। अल्लाह-हू-अकबर का नारा विरोध की आवाज बन गया है। पाकिस्तान के खिलाफ भी लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है। सोशल मीडिया पर पाकिस्तान पर प्रतिबंध लगाने की मांग उठ रही है। यहां लोगों को लग रहा है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान के खिलाफ है और तालिबान का समर्थन कर रहा है।

पत्रकारों का ग्राउंड पर जाना मुश्किल

पत्रकारों के लिए यह वक्त और भी मुश्किल है। जहां तालिबान का नियंत्रण है वहां पत्रकार आसानी से नहीं जा सकते हैं। कई बार इन इलाकों से लोग फेसबुक पर पोस्ट करते हैं, उससे ही वहां के हालात का पता चल पाता है, लेकिन पत्रकार ग्राउंड पर नहीं पहुंच पा रहे हैं।

काबुल से बाहर सेना की मदद के बिना रिपोर्टिंग बहुत मुश्किल है। वह भी दिनों-दिन मुश्किल होती जा रही है। तालिबान और सरकार की तरफ से जानकारी भी आसानी से नहीं मिलती। मिलती भी है तो दोनों के अपने-अपने दावे होते हैं। उनकी पड़ताल करना करीब-करीब असंभव हो गया है। ऐसे में अधिकतर रिपोर्ट संपर्कों और सूत्रों के जरिए ही हो रही हैं। बाकी मीडिया, सरकार और तालिबान से आने वाले बयानों पर निर्भर हो गया है।

उम्मीद फिर भी कायम है

युद्धग्रस्त इलाकों से आए प्रवासी जिन कैंपों में रह रहे हैं, उनमें पीने के शुद्ध पानी और खाने का पर्याप्त सामान नहीं है। देश में काम करने वाले NGO और विदेशी संस्थानों के लोग भी देश छोड़ रहे हैं, इससे हालात और बदतर हो गए हैं।

कूचा-ए-गुल-फरोशी, काबुल का फूलों का बाजार है। यहां अब भी खरीदारों की भीड़ है। यहां कई ब्यूटी पार्लर भी हैं, जहां सजी-धजी दुल्हनें और लड़कियां दिखाई देती हैं। युद्ध और हिंसा सिर पर है, लेकिन इन्हें देखकर लगता है कि वो अपनी नई जिंदगी को लेकर उम्मीदों से भरी हैं।

बुधवार शाम मैं काबुल के बीचोंबीच फरोश-गाह इलाके में कुछ नर्सिंग होम्स में गया था। वहां मैटरनिटी सेंटर में मैंने कई नवजात बच्चों को देखा। उनकी मां भले ही आशंकित थीं, लेकिन नवजात बच्चों के चेहरे खिले हुए थे, मानों वो कह रहे हों कि चाहे जो हो, अफगानिस्तान में जिंदगी चलती रहेगी।

(नोट: डायरी शैली में लिखी गई यह रिपोर्ट काबुल के एक पत्रकार से दैनिक भास्कर की रिपोर्टर पूनम कौशल की बातचीत पर आधारित है।) साभार-दैनिक भास्कर

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