Sunday, November 28, 2021
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अफ़ग़ानिस्तान की कमान तालिबान के हाथ में आने पर क्या बोला इस्लामिक स्टेट?

पढ़िये बीबीसी न्यूज़ हिंदी की ये खास खबर….

खुद को ‘इस्लामिक स्टेट’ कहने वाले चरमपंथी संगठन ने अफ़ग़ानिस्तान के हालिया घटनाक्रम पर कहा है कि तालिबान को वहां कोई जीत हासिल नहीं हुई है बल्कि अमेरिका ने इस मुल्क की कमान उन्हें सौंप दी है.

‘इस्लामिक स्टेट’ ने अपने साप्ताहिक अख़बार अल-नबा के 19 अगस्त के संपादकीय में कहा है, “ये अमन के लिए जीत है, इस्लाम के लिए नहीं. ये सौदेबाज़ी की जीत है न कि जिहाद की.”

आईएस ने ‘नए तालिबान’ को ‘इस्लाम का नक़ाब पहने’ एक ऐसा ‘बहुरूपिया’ करार दिया जिसका इस्तेमाल अमेरिका मुसलमानों को बरगलाने और क्षेत्र से इस्लामिक स्टेट की उपस्थिति ख़त्म करने के लिए कर रहा है.

इससे पहले इस्लामिक स्टेट के समर्थक ये आरोप लगाते रहे हैं कि तालिबान अमेरिका के गंदे कामों को अंज़ाम दे रहा है.

अपने ताज़ा बयान में आईएस ने कहा है कि वे जिहाद के नए चरण की तैयारी कर रहे हैं. हालांकि उन्होंने ये स्पष्ट नहीं किया है कि उनका अगला टारगेट क्या है लेकिन जिस संदर्भ में उन्होंने ये बात कही, उससे ये अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि वे अफ़ग़ानिस्तान की ओर संकेत कर रहे हैं.

तालिबान और इस्लामिक स्टेट की अदावत

अफ़ग़ानिस्तान में इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी को कमज़ोर करने में तालिबान की अहम भूमिका रही है. ख़ासकर साल 2019 में इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ तालिबान, अमेरिका और अफ़ग़ान सुरक्षा बलों ने एक साथ मोर्चा खोल दिया था जिससे पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान में आईएस को अपना मजबूत किला गंवाना पड़ा.

इसके बाद से इस्लामिक स्टेट तालिबान पर अमेरिका के साथ मिलीभगत करने का इलज़ाम लगाता रहा है.

फरवरी, 2020 में तालिबान ने अमेरिका के साथ ये समझौता किया था कि वे अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल दूसरे जिहादी गुटों को नहीं करने देंगे. इस पर इस्लामिक स्टेट ने कहा था कि वे ऐसे समझौतों से बंधे हुए नहीं हैं और अफ़ग़ानिस्तान में अपना जिहाद जारी रखेंगे.

अपने ताज़ा संपादकीय में इस्लामिक स्टेट ने तालिबान के उस वादे पर संदेह जताया है जिसमें ‘वास्तविक’ शरिया क़ानून को लागू करने की बात कही गई थी.

दोनों की लड़ाई कब शुरू हुई थी?

छह साल पहले साल 2015 के जनवरी महीने में दोनों गुटों ने एक दूसरे के ख़िलाफ़ जंग का एलान कर दिया था. तब इस्लामिक स्टेट ने अपनी ‘खुरासन शाखा’ के गठन की घोषणा की थी. अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान और मध्य एशिया के कुछ हिस्सों को इतिहास में खुरासन के नाम से जाना जाता है. तब ये पहली बार हुआ था कि इराक़ और सीरिया में अपनी जड़े रखने वाले इस्लामिक स्टेट ने पहली बार अरब दुनिया से बाहर अपने विस्तार की घोषणा की थी.

इस्लामिक स्टेट या दाएश पहला ऐसा बड़ा चरमपंथी संगठन है जिसने तालिबान के तत्कालीन नेता मुल्ला मोहम्मद उमर की सत्ता को चुनौती दी थी. तालिबान के लड़ाके मुल्ला मोहम्मद उमर को ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ़ अफ़ग़ानिस्तान’ के ‘आमिर-उल-मोमिन’ (वफ़ादारों का लीडर) माना जाता था.

अल-कायदा के नेताओं ने तालिबान की पनाह ली थी और वे मुल्ला मोहम्मद उमर की सत्ता को स्वीकार करते थे लेकिन इस्लामिक स्टेट उनकी खुलकर मुफालफत किया करता था. आईएस का ये इलज़ाम था कि तालिबान पाकिस्तान की आईएसआई के हितों को बढ़ावा दे रहा है.

इस्लामिक स्टेट बनाम इस्लामिक अमीरात

दोनों जिहादी गुटों के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद रहे हैं. इस्लामिक स्टेट एक ऐसा चरमपंथी संगठन है जो ऐसे वैश्विक जिहाद की बात करता है जो किसी देश की सरहद से बंधा हुआ नहीं हो. आईएस का लक्ष्य सभी मुस्लिम देशों और इलाकों के लिए एक राजनीतिक इकाई की स्थापना रही है.

दूसरी तरफ़ तालिबान का जोर इस बात पर रहा है कि उनके एजेंडे का दायरा केवल अफ़ग़ानिस्तान तक सीमित है. ‘अफ़ग़ानिस्तान को विदेशी कब्ज़े से मुक्त कराना’ उनका घोषित लक्ष्य रहा है. तालिबान लंबे समय समय से इस बात ज़ोर देता रहा है कि सभी विदेशी सेनाओं को अफ़ग़ानिस्तान से चले जाना चाहिए.

दोनों संगठनों के बीच धार्मिक मसलों पर भी मतभेद हैं. तालिबान मूलत: सुन्नी इस्लाम की हनफी शाखा पर अमल करने वाले लोग हैं. ज़्यादातर सुन्नी अफ़ग़ान इसी धारा के लोग हैं. दूसरी तरफ़ इस्लामिक स्टेट सुन्नी इस्लाम की वहाबी/सलफी शाखा को मानने वाले लोग हैं. साभार-बीबीसी न्यूज़ हिंदी

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