Tuesday, November 30, 2021
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दो दोस्तों ने शुरू किया सबसे बड़ा एक्वापोनिक फार्म, टीम में 85 महिलाएं भी; 1500 किसान 300 एकड़ में कर रहे खेती

पढ़िये दैनिक भास्कर की ये खास खबर….

आपने आस-पास ट्रेडिशनल यानी कनवेंशनल फार्मिंग होते हुए देखी होगी। पॉली फार्मिंग देखी होगी, हाइड्रोपोनिक भी देखी होगी, लेकिन क्या आपने एक्वापोनिक्स फार्मिंग के बारे में सुना है? मछलियों के वेस्ट से होने वाली खेती का ये तरीका अभी भी भारत में बहुत नया है।

आज की पॉजिटिव स्टोरी में बात 32 साल के दो दोस्त ललित जवाहर और मयंक गुप्ता की, जो देश का सबसे बड़ा कॉमर्शियल एक्वापोनिक फार्म चला रहे है। इसके जरिए वो न सिर्फ ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं बल्कि लोगों को रोजगार देने के साथ ही करोड़ों का बिजनेस मॉडल भी चला रहे हैं। जानिए 2018 में शुरू हुए इस अनोखे स्टार्टअप के बारे में…

IIT Bombay से की इंजीनियरिंग

हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाले मयंक ने साल 2007 में IIT Bombay में B Tech और M Tech में दाखिला लिया। 2012 में प्लेसमेंट हुआ और उन्होंने तीन साल न्यूयॉर्क की एक कंपनी में बतौर एनालिस्ट काम किया। काम के सिलसिले में अक्सर मयंक का मुंबई आना-जाना लगा रहता था। इस दौरान ही उन्हें एहसास हुआ कि वो 9 टु 5 की जॉब के साथ नहीं जी सकते। अब बारी थी मयंक की जिंदगी में एक और मोड़ की। उन्होंने US की कोलंबिया यूनिवर्सिटी में MBA के लिए अप्लाई किया। सिलेक्शन हुआ और जाने की तैयारियां भी शुरू हो गईं।

बैंकॉक के स्ट्रीट मार्केट को पहुंचाया ऑनलाइन

इसी बीच कई बार उनके और उनके दोस्तों की स्टार्टअप को लेकर बात होती रहती थी। मयंक बताते हैं, ‘उस समय स्टार्टअप का दौर शुरू ही हुआ था। ऑनलाइन शॉपिंग का दुनियाभर में खुमार छाया था। हमने रिसर्च में पाया कि साउथ-ईस्ट एशिया में उठ रही डिमांड के हिसाब से ऑनलाइन स्टार्टअप एक अच्छी शुरुआत है। 2015 में हम 4 दोस्तों ने बैंकॉक जाकर स्टार्टअप zilingo.com की शुरुआत की। इसके जरिए हमने स्ट्रीट शॉपिंग को ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर मुहैया करवाया। ये इनिशिएटिव काफी सक्सेसफुल रहा और बहुत सी कंपनियों ने इसमें फंडिंग भी की।

अपने इस स्टार्टअप के दौरान मयंक को बहुत सी नई चीजें सीखने को मिलीं, लेकिन दूसरे देश की चकाचौंध के बीच मयंक अपने देश की मिट्टी को बहुत याद करते थे। वो शहरों से तंग आकर भारत के हरे-भरे क्षेत्र में कुछ नया शुरू करना चाहते थे। उन्होंने भारत वापस लौटने का मन बनाया, लेकिन एक सवाल अब भी उनके सामने खड़ा था… आगे क्या किया जाए?

साल 2018 में उनकी अपने मुंबई के एक पुराने दोस्त ललित जवर से इस बार में बात हुई। दोनों ने डिसाइड किया कि मिलकर फार्मिंग से जुड़ा एक स्टार्टअप शुरू करते हैं जिससे रोटी, कपड़ा, मकान और दवाई जैसी चार बेसिक चीजें लोगों तक पहुंचाई जा सकें।

देश-विदेश में की रिसर्च

यह नेटपॉट में लगे पौधे हैं, इनकी जड़ों में पहुंचने वाला पानी मछली पालन के पानी का वेस्ट है। ऑर्गेनिक फॉर्मिंग का यह भारत में बिल्कुल नया तरीका है।

मयंक बताते हैं कि हमें रिसर्च के दौरान ही इस बात का अंदाजा हो गया था कि भारत में ऑर्गेनिक फार्मिंग प्रेक्टिसेस में बहुत कम इनोवेशन और डेवलपमेंट हुए हैं। साथ ही भारत में किसान ट्रेडिशनल फार्मिंग करते हैं और फसल की उपज बढ़ाने के लिए वो इसमें ढेर सारे फर्टिलाइजर और कीटनाशक का इस्तेमाल करते हैं। इससे ज्यादातर खेती लायक जमीन और पानी जहरीला हो जाता है। इन सभी परेशानियों का एक ही समाधान था ऑर्गेनिक खेती।

मयंक और ललित ने अपने इस इनिशिएटिव के लिए देश-विदेश में रिसर्च की। दोनों ने USA, चाइना, इजराइल, हॉन्गकॉन्ग और थाईलैंड जैसे कई देशों में रिसर्च कर ऑर्गेनिक और सस्टेनेबल फार्मिंग की नई तकनीक सीखी। इनमें से भारत के लिए एक्वापोनिक्स खेती सबसे फिट बैठी। अब जरूरी था इसके लिए भारत में सबसे सही जगह का चुनाव करना।

मयंक बताते हैं- चूंकि हम एक नई शुरुआत करने जा रहे थे, इसलिए हम लोकेशन को लेकर इंडिपेंडेंट थे। यानी भारत के किसी भी हिस्से में स्टार्टअप शुरू कर सकते थे, बस शहर की आपा-धापी से दूर।

इसके लिए हमनें भारत के हर डिस्ट्रिक्ट को क्लाइमेट, पानी, मिट्टी, किसानों की उपलब्धता और मार्केट जैसे पहलुओं पर परखा और इन सब पर खरा उतरा महाराष्ट्र का कोल्हापुर। यहां अच्छी मिट्टी और पानी की उपलब्धता है क्योंकि यहां कभी सूखा नहीं पड़ा।

महिलाओं को दे रहे रोजगार

मयंक के स्टार्ट अप लेंड क्राफ्ट एग्रो में काम करने वाली महिलाओं की संख्या 80% ज्यादा है। मयंक का कहना है कि इसके जरिए वुमन एम्पावरमेंट भी हो रहा है।

मयंक बताते हैं कि इन सारी रिसर्च के बाद हमने देश के सबसे बड़े एक्वापोनिक्स फार्म लेंड क्राफ्ट एग्रो की शुरुआत की। ये पूरे दो एकड़ जमीन पर फैला हुआ है। लेंड क्राफ्ट एग्रो न सिर्फ एक्वापोनिक खेती के जरिए आस-पास के लोगों को रोजगार दे रहा है बल्कि महिला सशक्तिकरण और आसपास के किसानों को रोजगार भी मुहैया करा रहा है। टीम के 100 लोग डायरेक्ट फील्ड पर काम करते हैं, जिनमें से 85 महिलाएं हैं।

एक्वापोनिक और हाइड्रोपोनिक खेती में अंतर

खेती के इस तरीके से मछली पालन के साथ उसके वेस्ट से अच्छी फसल का उत्पादन भी लिया जा सकता है।

खेती से पानी की बचत

एक्वापोनिक खेती जलवायु के हिसाब से किसी भी क्षेत्र में की जा सकती है। खास बात ये है कि इसमें पानी की भी काफी बचत होती है। मयंक बताते हैं कि पिछले दो सालों से उनके सेटअप पर जिस पानी का इस्तेमाल हो रहा है, उसे अभी तक बदलने की जरूरत नहीं पड़ती है। एक्वापोनिक खेती से 95% पानी की बचत होती है। अगर इसकी तुलना ट्रेडिशनल फार्मिंग से की जाए तो इसमें सिर्फ 5% पानी लगता है।

छोटे स्तर पर भी कर सकते हैं एक्वापोनिक खेती

एक्वापोनिक खेती के जरिए उगाई गई सब्जियां। इस तरीके से खेती में स्टेप बाय पौधे लगाए जाते हैं, जिससे साल भर उनकी सप्लाई चेन बनी रहती है।

लेंड क्राफ्ट एग्रो के साथ 1500 किसान जुड़े हुए हैं जो छोटे-छोटे स्तर पर एक्वापोनिक खेती कर रहे हैं। उनकी टीम इन किसानों को सस्ते तरीके से एक्वापोनिक खेती की ट्रेनिंग भी देती है। जिसके चलते आज 300 एकड़ जमीन पर मयंक से जुड़े लोग काम कर रहे हैं।

ऐसे करें एक्वापोनिक खेती

एक्वापोनिक खेती को दो पार्ट में किया जाता है। सबसे पहले एक टैंक में मछली पालन किया जाता है। मछलियों से निकलने वाला वेस्ट को कलेक्ट किया जाता है। ये वेस्ट न्यूट्रिशन से भरपूर होता है।

दूसरे स्टेप में नर्सरी के नेट पॉट में पौधा लगाया जाता है। इसके बाद पॉलीहाउस में इस पौधे को मेन प्लांट में ट्रांसप्लांट किया जाता है। पौधे को फ्लोटिंग बेस पर रखा जाता है, जिससे वो पानी में डूबे नहीं। जिस पानी में पौधे की जड़ डूबी रहती है उसमें मछली का वेस्ट मिलाया जाता है। पौधे की जड़े इसमें मौजूद न्यूट्रिशन को सोख लेती हैं।

इन पौधों को किसी भी तरह के रोग से बचाने के लिए पानी में बुलबुलों के जरिए ऑक्सीजन दी जाती है। रिजल्ट मिलता है ऑर्गेनिक सब्जियां। यही वजह है कि एक्वापोनिक खेती को हाइड्रोपोनिक खेती से बेहतर माना जाता है। USA में एक्वापोनिक खेती को ऑर्गेनिक खेती का सर्टिफिकेट भी दिया जा चुका है।

365 दिन की सप्लाई चेन से करोड़ों का फायदा

मयंक अपने फार्म पर स्टेप बाय स्टेप फसल लगाते हैं। जिससे साल के 365 दिन सप्लाई चेन बनी रहती है। ये आम खेती में संभव नहीं हो पाता। अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग के बारे में मयंक बताते हैं- हमने शुरू से ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के साथ-साथ वेबसाइट का सहारा लिया। जिससे आसानी से कम समय में ज्यादा लोगों तक पहुंचा जा सका। हमारे 200 से ज्यादा सुपर मार्केट बेस्ड परमानेंट कस्टमर्स हैं, जिन्हें हर दिन 5000 से ज्यादा पैकेट भेजे जाते हैं। उनके पास 65 से ज्यादा प्रोडक्ट शामिल हैं।

अब ये टीम सब्जियों की पैकेजिंग पर QR code टेक्नोलॉजी डेवलप कर रही है। जिससे सब्जी की ताजगी से लेकर ग्राहक के बारे में आसानी से जानकारी ली जा सकती है। मयंक और ललित ने अपने इस स्टार्टअप की शुरुआत 40% सेविंग्स और 60% बैंक से लोन लेकर की थी, जिसका सालाना टर्नओवर कुल 4 करोड़ रुपए है। इसमें सब्जी से लेकर मछली पालन से होने वाला फायदा शामिल है।

साभार-दैनिक भास्कर

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