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बेबस माँ: अंतिम संस्कार करने के लिए पैसे नहीं थे तो दान कर दिया बेटे का शव

बेबस माँ: अंतिम संस्कार करने के लिए पैसे नहीं थे तो दान कर दिया बेटे का शव

छत्तीसगढ़। जगदलपुर का महारानी मेडिकल कॉलेज जहाँ गुरुवार को बेबसी के बोझ से दबी एक मां ने अपने लाडल का शव मेकॉज प्रबंधन को सौंप दिया। इसके पीछे बुजुर्ग मां की सहमति तो थी, लेकिन उसके पीछे बड़ी मजबूरी छिपी थी। दरअसल, इस परिवार के पास बेटे का शव घर ले जाने और अंतिम संस्कार के लिए रुपए ही नहीं थे। परिवार के लोग घंटों पसोपेश में बैठे रहे कि क्या करें, फिर एक शिक्षक की सलाह पर इन्होंने शव मेकॉज के एनोटॉमी विभाग को दान कर दिया।

इस परिवार को अस्पताल प्रशासन के किसी जिम्मेदार ने अंतिम संस्कार व शव घर पहुंचाने की सरकारी योजनाओं की जानकारी देना तक मुनासिब नहीं समझा। जबकि राज्य सरकार लोगों की सुविधा के लिए हॉस्पिटल में मौत के बाद शव घर तक भिजवाने के लिए मुक्तांजलि योजना और अंतिम संस्कार के लिए पुष्पाजंलि योजना चलाती है। अंत्येष्टि के लिए जरूरतमंद परिवार को तत्काल 2 हजार रुपए दिए जाते हैं। ऐसी योजनाओं के बाद भी आदिवासी परिवार को अपने 21 साल के जवान बेटे की देह सिर्फ गरीबी के कारण मेडिकल कॉलेज को दान देनी पड़ी।

बड़े आरापुर निवासी 21 वर्षीय बामन अपने बड़े भाई आैर भाभी के साथ गांव में रहता था। वह एक निजी ट्रैवल कंपनी में कंडक्टर था। सोमवार को अज्ञात वाहन ने बड़े आरापुर के पास उसे टक्कर मार दी। मेकाॅज में गुरुवार को उसने दम तोड़ दिया। मरच्यूरी में भाई-भाभी और मां भी पहुंच गए। पीएम रूम के बाहर परिजन उसे गांव तक ले जाने और अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं होने की चर्चा कर रहे थे। इसी बीच यहां किसी परिचित के पीएम के लिए आए हॉर्टीकल्चर कॉलेज के डॉ. पीके तिवारी की मुलाकात इनसे हुई। डॉ. तिवारी ने परिजनों को शव मेडिकल कॉलेज को दान देने की सलाह दी। आर्थिक तंगी से जूझ रहे परिजनों ने इसके बारे में सहमति बनाई, फिर एनोटॉमी विभाग के डॉ. अशरफ ने औपचारिकता पूरी कर शव अपने कब्जे में ले लिया।

बामन की देह मेकाॅज के एनोटॉमी विभाग ने ली है। शव दान करने के दस्तावेजों पर मृतक की मां सुधरी बाई ने अंगूठा लगाया है। सुधरी बाई ने बताया कि वो गीदम में रहती हैं। उसका बेटा अपने भईया-भाभी के साथ बड़े आरापुर में रहता था। जब उनसे पूछा गया कि सरकार अंतिम संस्कार के लिए कई योजनाएं चलाती है, इसका लाभ क्यों नहीं ले रही हैं। उन्होंने कहा कि इस बारे में उन्हें जानकारी नहीं, किसी ने बताया भी नहीं था।

बामन की भाभी प्रेमवती ने बताया कि चार दिनों से उनका देवर भर्ती था। वे इलाज के लिए भी परेशान रहे। परिवार मजदूरी कर गुजर-बसर करता है। ऐसे में उसका अंतिम संस्कार कैसे करते? जब उन्हें बताया गया कि पंचायत अंतिम संस्कार के लिए पैसे देती है तो प्रेमवती ने कहा कि ऐसी कोई जानकारी उन्हें किसी ने नहीं दी है।

मेडिकल कॉलेज के डीन यूएस पैंकरा ने बताया कि एनाटॉमी डिपार्टमेंट ने उन्हें सिर्फ दान में शव मिलने की बात कही थी। परिजन शव क्यों दान में दे रहे हैं, इसकी जानकारी उनके पास नहीं थी। उन्होंने कहा कि युवक की मौत महारानी हास्पिटल में हुई है। जब उनसे पूछा कि क्या परिजनों को बताया गया था कि शव को मुफ्त में घर तक पहुंचाने और अंतिम संस्कार के लिए सरकार की ओर से आर्थिक सहायता दी जाती है तो इस पर वे बोले -युवक की मौत महारानी हॉस्पिटल में हुई है और वह डिमरापाल स्थित कॉलेज में है। हॉस्पिटल में ऐसी जानकारी युवक के परिजनों को दी गई थी या नहीं इसकी जानकारी उनके पास नहीं है।

 

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