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फास्ट फूड सुविधा के साथ-साथ बन रहा चिंता का विषय

फास्ट फूड सुविधा के साथ-साथ बन रहा चिंता का विषय

नई दिल्ली। रेडीमेड फूड से लेकर प्रिजव्र्ड फूड व पेय ने युवा वर्ग को इस तरह लपेटा कि अब इससे छुटकारा नामुमकिन दिखाई देता है।  अमेरिका में वर्ष 2015 में इसका रेडीमेड फूड के कारोबार दो सौ बिलियन डॉलर के आसपास था। सबसे बड़ी बात यह है कि इस उद्योग की गति काफी तेज होती जा रही है। विश्व में दस सबसे बड़े फास्ट फूड के ब्रांड हैं, जिनकी सालाना आय व धंधा मिलियन डॉलर में हैं। उदाहरण के लिए, मैक्डोनल्ड्स का धंधा, जिसके 30,000 से ज्यादा आउटलेट पूरी दुनिया में हैं, 97,723 मिलियन डॉलर का हैै।

इसी तरह, स्टारबक, सबवे, केएफसी, पिज्जा हट्ट जैसे बडे़ ब्रांडों ने क्रमश: 44,230; 21,713; 13,521; 8,133 मिलियन डॉलर का 2017 में व्यापार किया। अन्य ब्रांड भी, जैसे डोमिनोज, टिम हॉट्न्र्स, टाको बैल, चिपोल और बर्गर किंग हजारों मिलियन डॉलर का फास्ट फूड परोस देते हैं। अब भारत देश भी रेडीमेड फूड के पूरे कब्जे में है। शोध संगठन सिंट के एक सर्वे के अनुसार, 33़.66 फीसदी भारतीयों ने स्वीकारा है कि वे हफ्ते में कम से कम दो बार जंक फूड खाते ही खाते हैं।

यही कारण है कि भारत में भी रेडीमेड फूड का उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसकी वार्षिक प्रगति दर 40 फीसदी मानी गई है। बता दें, भारत का फास्ट फूड उपभोग में 10वां स्थान है और प्रति व्यक्ति अपनी कमाई का 2़17 फीसदी इस पर खर्च करता है। आज यहां यह लगभग 8,500 करोड़ रुपये का व्यापार है। एसोचेम के अनुसार, वर्ष 2020 तक यह कारोबार  25,000 करोड़ रुपये का हो जाएगा।

सुविधा के साथ-साथ यह हमारे लिए एक चिंता का विषय भी है जो कि आये दिन लोगों के लिए मोटापा का कारण बनता जा रहा है। फ़ास्ट फ़ूड का सेवन जितना ही आसन है इसमें हानिकारक तत्व भी उतने ही मौजूद होते हैं जो शरीर को नुकसान पहुचातें हैं। ख़ास कर इसकी लत बच्चों में अधिक पाई जाती है जो ख़ास कर घर में भी पौष्टिक आहार नहीं लेते बर्गर और पिज्जा इत्यादि के चलते।

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