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कुछ हम भी सीखें: यहाँ पर्यावरण की रक्षा के लिए उपले में जलाया जाता है शव

कुछ हम भी सीखें: यहाँ पर्यावरण की रक्षा के लिए उपले में जलाया जाता है शव

कोलकाता। एक कहावत है ‘अंत भला तो सब भला’। शायद इसी युक्ति को ध्यान में रखते हुए महानगर कोलकाता के नीमतला श्मशान घाट पर दाह संस्कार की नई विधि शुरू की गई है, जो पैसे और समय की बचत करने के साथ पर्यावरण की रक्षा भी करती है। जीते-जी हर मनुष्य जाने-अनजाने पर्यावरण को किसी ना किसी तरह का नुकसान पहुंचाता है, लेकिन व्यक्ति के मरने के बाद उसके शव के अंतिम संस्कार से पर्यावरण पर किसी तरह का कोई प्रतिकूल असर ना पड़े, इसी के मद्देनजर महानगर कोलकाता के नीमतला श्मशान घाट पर गोबर के कंडों यानी उपलों से दाह संस्कार की शुरुआत की गई।

यहां उल्लेखनीय है कि लकड़ी से दाह संस्कार की तुलना में उपले से शव दाह करने में समय और खर्च कम लगता है। पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यह बहुत अच्छी और सराहनीय शुरुआत है, क्योंकि इस विधि से शव दाह करने पर सीधे तौर पर लकड़ियों की बचत होगी इससे पर्यावरण का संतुलन भी बना रहेगा।

गौरतलब है कि महीनों इंतजार के बाद प्रेरणा फाउंडेशन, कलकत्ता पिंजरापोल सोसाइटी व गोसेवा परिवार की गोबर गोष्ठी संस्कार विधि की संयुक्त पहल को आखिरकार कोलकाता नगर निगम ने बीते दिनों अनुमोदित कर दिया और पहली बार नौ जनवरी को नीमतला श्मशान घाट में गोबर के उपले से एक शव का अंतिम संस्कार किया गया। प्रेरणा फाउंडेशन के प्रमुख पवन टिबड़ेवाल ने ‘जनसत्ता’ को बताया कि गोबर के उपले से दाह संस्कार पैसे और समय की बचत तो करता ही है, सबसे बड़ी बात यह है कि यह विधि हिंदू धार्मिक नजरिए से महत्त्वपूर्ण है और पर्यावरण की रक्षा में सहायक भी।

बीते साल (2017) फरवरी में महाराष्ट्र के नागपुर से लोगों को बुलाकर नगर निगम के अधिकारियों की मौजूदगी में इस विधि का लगातार चार दिन तक परीक्षण किया गया, जिसकी रिपोर्ट नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग को सौंपी गई। नगर निगम के कई अधिवेशनों और मेयर परिषद के सदस्यों की कई बैठकों में इस बाबत चर्चा हुई, नगर निगम के संबंधित विभाग ने पर्यावरण प्रेमियों व जानकारों से राय ली और फिर गोबर गोष्ठी संस्कार विधि को हरी झंडी दिखाई।
उन्होंने बताया कि गोबर के कंडे की व्यवस्था कलकत्ता पिंजरापोल सोसाइटी करती हैं। टिबड़ेवाल के मुताबिक एक शव को दाह करने में लगभग 240 किलो लकड़ी लगती थी, वहीं 202 किलो गोबर के उपले में ही दाह संस्कार हो जाता है। वहीं, कलकत्ता पिंजरापोल सोसाइटी के सुरेंद्र चमड़िया ने कहा कि गोबर गोष्ठी संस्कार विधि वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित हैं।

सबसे पहले इस विधि से महाराष्ट्र के नागपुर में दाह संस्कार शुरू किया गया था। इसके बाद इस विधि से असम में दाह संस्कार प्रारंभ हुआ। बीती नौ जनवरी को पश्चिम बंगाल देश का तीसरा राज्य बना, जहां गोबर गोष्ठी संस्कार शुरू किया गया। उनके मुताबिक शुरुआती दौर पर रोजाना दो से तीन शव दाह के लिए गोबर गोष्ठी संस्कार विधि व्यवहार की जा रही है।

आने वाले दिनों में जैसे-जैसे लोगों को इसकी जानकारी मिलेगी और उनमें पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ेगी, वैसे-वैसे गोबर गोष्ठी संस्कार विधि से दाह संस्कार के आंकड़ों में भी इजाफा होगा। इस बाबत कोलकाता नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग के मेयर परिषद के सदस्य का अतिन घोष ने बताया कि आने वाले दिनों में अन्य श्मशान घाटों पर भी गोबर गोष्ठी संस्कार विधि की शुरुआत की जाएगी।

नीमतला श्मशान घाट के अधिकारियों के मुताबिक औसतन रोजाना 120 शव यहां दाह संस्कार के लिए आते हैं, जिनमें से तकरीबन एक सौ शवों का बिजली के चूल्हे के जरिए अंतिम संस्कार किया जाता है और बाकी शवों का लड़कियों से। श्मशान घाट के अधिकारियों ने बताया कि यहां तीन तरीके से शव का दाह किया जाता है।

एक है बिजली चूल्हा, जिसमें 45 मिनट समय लगता है और ढाई सौ रुपए की लागत आती है। दूसरा है लकड़ी से, जिसमें पौने तीन घंटे समय लगता है और 26 सौ रुपए खर्च आता है। तीसरा और बिल्कुल नया तरीका है गोबर के कंडों से, जिसमें सवा दो घंटे का समय लगता है और साढ़े 17 सौ का व्यय होता है।

(सभार शंकर जालान) 

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By प्रगति शर्मा : Thursday 22 फ़रवरी, 2018 14:12 PM