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माँ-बाप ने जबरन ढकेला था देह व्यापार में, एनजीओ का साथ मिला और बदल गई जिन्दगी

माँ-बाप ने जबरन ढकेला था देह व्यापार में, एनजीओ का साथ मिला और बदल गई जिन्दगी

नई दिल्ली। गाली-गलौच करने वाला पिता और मां, जिसे जबरन रेड लाइट एरिया में धंधा करने को भेज दिया गया हो, उसकी बेटी नूतन की जिंदगी शादी के बाद भी उम्मीद के हिसाब से नहीं बदली। पिता की तरह ही पति भी अपशब्दों का इस्तमाल करने वाला और उसकी पिटाई करने वाला निकला। ये तब तक चलता रहा जब तक नूतन के बच्चों की भी उसी तरह पिटाई होने लगी। इसी के बाद नूतन ने यह तय कर लिया कि वो अब और बर्दाश्त नहीं करेगी और अपने बच्चों के लिये जिंदगी अपनी बदल कर रहेगी। हालांकि यह भी उसके लिये आसान नहीं था।

नूतन की मां ने उसे पति का साथ छोड़ने के बाद साथ रखने से मना कर दिया। फिर नूतन ने एक एनजीओ से संपर्क किया और आज 2 महीने के बाद उसकी ज़िंदगी बदल गई है। अत्याचार बर्दाश्त करने वाली और पिता और पति पर निर्भर रहने वाली नूतन अब आत्मनिर्भर है, और अपने बच्चों को अच्छी परवरिश दे रही है। फिलहाल बच्चों का खर्च एनजीओ उठा रहा है, जबकि नूतन अपनी नई जिंदगी को नई दिशा देने के लिये काम सीख रही है, ताकि आगे चल कर उसे किसी के आगे हाथ ना फैलाना पड़े।

नूतन बताती हैं, “मैं दर्जी का काम सीख रही हूं, और शायद किसी दिन डिज़ाइनर बन जाऊं, जब मैं अपने जैसी और रेड लाइट एरिया में जबरन धकेली गई लड़कियों को जीने का दूसरा रास्ता दिखा सकूं।“ नूतन ने अपने बारे में यह सब ह्यूमन्स ऑफ बॉम्बे के साथ साझा की थी, जिसे दर्शकों ने पढ़ने के बाद काफी शेयर किया है। पेज की पोस्ट में उनकी कहानी इस तरह से है, ‘दूर गांव में रहने की वजह से हमें पता था कि मां-पिताजी मुंबई में रहकर हमारे लिये कमाते थे। मैं 10 साल की हुई, तो शहर आई मां-पिता के साथ, तो पता चला कि मेरे पिता नशा करते हैं, मां के साथ गाली-गलौच करते हैं, उनकी हर रात पिटाई करते हैं, और तो और उन्हें सोनापुर में जबरन देह-व्यापार में धकेल रखा है।

मुझे अपनी मां के लिये बहुत सम्मान था क्योंकि मैं जानती थी, कि वो यह सब हमारे लिये ही झेल रही थीं। हमारा पेट भरा रहे इसलिये हमारी नर्म दिल की मां सख्त बन गईं थीं। 13 साल की उम्र में मेरी शादी करा दी गई। ठीक वैसे ही आदमी से जो मेरे पिता से किसी मामले में कम नहीं था। जैसे ही मैंने बच्चों को जन्म दिया, वैसे ही मेरे पति ने मुझे भी देह-व्यापार में भेजने की पुरज़ोर कोशिश की कि मैं अपनी मां की देखरेख में वहां से पैसे कमा कर लाउं। मैंने जाने से मना कर दिया, और नतीजा उसकी पिटाइयां झेलती रहीं। यहां तक कि वो खुद भी रेड लाइट एरिया में अक्सर जाया करता था।

जल्दी ही यही हालात मेरे बच्चों के साथ होने लगे। उनकी पिटाई करने लगा मेरा पति। यह मेरे बर्दाश्त की इंतहा थी। मैं बच्चों के साथ अपनी मां के घर निकल ली, पर मां ने भी सहारा नहीं दिया, और कहा कि वापस कभी नहीं आना। अब मेरे पास की रास्ता नहीं था। बच्चों को लेकर स्टेशन पर पहुंची और बेंच पर उन्हें सुला दिया। हाथ में एक भी पैसे नहीं थे, कुछ सूझ नहीं रहा था। तभी याद आया कि एनजीओ पुरनाता से एक दीदी आती थी जिन्होंने हमें जरूरत पड़ने पर फोन करने को कहा था। किसी से फोन मांग कर उनको कॉल किया, और थोड़ी ही देर में कुछ लोग आकर हमें वहां से ले आए।

बस से ही पिछले 2 महीनों में मेरी ज़िंदगी बदल गई है। अब में खुद पर भरोसा करती हूं और आत्मनिर्भर हूं। पुरनाता की शुक्रगुज़ार हूं कि वो मेरे बच्चों के ख्याल रख रहे हैं। उन्हें पढ़ा रहे हैं। जल्द ही उनका सारा खर्च में खुद उठाने लगूंगी, कोशिश जारी है। अपने बच्चों के हर संघर्ष करूंगी, और उनका भविषअय उज्जवल हो इस बात के लिये कोई कमी नहीं छोड़ूंगी।’

साभार- YOUR STORY HINDI

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By हमारा गाज़ियाबाद संवाददाता : Tuesday 24 अप्रैल, 2018 12:30 PM