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समय है समाज के सोच में परिवर्तन लाने का, महिलाओं को सशक्त बनाने का

समय है समाज के सोच में परिवर्तन लाने का, महिलाओं को सशक्त बनाने का

नई दिल्ली। महिलाओं की भागीदारी सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ रही है।’महिला सशक्तिकरण हो रहा है।’ ये कुछ चुनिन्दा पंक्तियां हैं जो यदा कदा अखबारों में, टीवी न्यूज़ चैनल पर, विभिन्न मंचों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक।

अपने क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाली, उपलब्धियां हासिल करने वाली कुछ महिलाओं का उदाहरण देकर हम महिलाओं की उन्नती को दर्शाते हैं। पर अगर गौर करें तो कुछ अद्भुत करने वाली महिलाएं तो हर काल में रही है। सीता से लेकर द्रौपदी, रज़िया सुल्तान से लेकर रानी दुर्गावति, रानी लक्ष्मीबाई से लेकर इंदिरा गांधी, किरण बेदी एवं सानिया मिर्ज़ा। परन्तु महिलाओं की स्थिति में कितना परिवर्तन आया? और आम महिलाओं ने परिवर्तन को किस तरह से अपनाया आज हम इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते?असल परिवर्तन तो आना चाहिए लेकिन आम लोगों के जीवन में। ज़रूरत है उनकी सोच में परिवर्तन लाने की। आम महिलाओं के जीवन में परिवर्तन, उनकी स्थिति में, उनकी सोच में परिवर्तन। आज के लिए यही है असली सशक्तिकरण। आज महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए समाज को सशक्त होना जरुरी है।

आज अपराध महिलाओं के खिलाफ बढ़ते ही जा रहा हैं। शहर असुरक्षित होते जा रहे हैं। कुछ चुनिंदा घटनाओं व लोगों की वजह से कई सारी अन्य महिलाओं एवं लड़कियों के बाहर निकलने के दरवाजे भी बंद हो जाते हैं। आज उन बंद दरवाजों को खोलने की बेहद आवश्यकता है। रौशनी को अंदर आने देने की जरुरत है। महिलाओं प्रकाश में अपना प्रतिबिम्ब देखने की। महिलाओं को अपना प्रतिबिम्ब निखारने की। इसके साथ-साथ उनता ही जरुरत है आत्म निर्भरता की।

लड़कियों को बचपन से सिखाया जाता है कि खाना बनाना ज़रूरी है। लेकिन आज खाना बनाने के साथ यह भी सिखाया जाये की कमाना भी ज़रूरी है। उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम होना भी ज़रूरी है। परिवार के लिये नहीं अपने आप के लिए। अगर शिक्षा में कुछ अंश जोड़ें जाये जो आपको किताबी ज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान भी दे। आपके कौशल को उपयुक्त बनाये। आपको इस लायक बनाये कि आप अपना खर्च तो वहन कर ही सकें। तभी शिक्षा के मायने सार्थक होंगे।

ज़रूरी नहीं कि हर कमाने वाली लड़की डॉक्टर, इंजिनियर या शिक्षिका हो। वे खाना बना सकती है। पार्लर चला सकती है। कपड़े सील सकती है। उन्हें ये सब आता है। वे ये सब करती है। पर सिर्फ घर में ही। उनके इसी हुनर को घर के बाहर लाना है। ज़रूरत है इस सोच को आगे बढ़ाने की। उनके कौशल को उनकी जीवन रेखा बनाने की। ताकि समय आने पर वे व्यवसाय कर सके। अपना परिवार चला सके।  ये उन्हें आत्मविश्वास देगा। वे समाज में सिर उठाकर चल पाएंगी।

विकास की मुख्यधारा में महिलाओं को लाने के लिये भारतीय सरकार के द्वारा कई योजनाओं को निरुपित किया किया गया है। पूरे देश की जनसंख्या में महिलाओं की भागीदारी आधे की है और महिलाओं और बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये हर क्षेत्र में इन्हें स्वतंत्रता की जरुरत है।

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