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जानिए मुस्लिम महिलाओं को क्यों पहनना पड़ता हैं ‘हिजाब’ या ‘नकाब’

जानिए मुस्लिम महिलाओं को क्यों पहनना पड़ता हैं ‘हिजाब’ या ‘नकाब’

नई दिल्ली। अल्लाह का पैग़ाम कही जाने वाली इस्लाम की पवित्र पुस्तक क़ुरआन में विस्तार से बताया गया है कि मुस्लिम महिलाओं को किस तरह का लिबास पहनना चाहिए। मुस्लिम महिलाओं के बारे में कहा गया है कि वे ऐसा लिबास पहनें जिससे उनका चेहरा, हाथ और पाँवों के अलावा शरीर का कोई हिस्सा नज़र नहीं आना चाहिए और यह लिबास वे ऐसे पुरुषों की मौजूदगी में अवश्य पहनें जो उनके रिश्तेदार नहीं हैं या उनसे उनकी शादी नहीं हुई है।

हालाँकि इस मुद्दे पर इस्लामी विद्वानों में भी ख़ासी बहस चलती रही है कि महिलाओं के लिबास की सही परिभाषा क्या है। इसी बहस की वजह से दो शब्द भी हैं- हिजाब और नक़ाब। हिजाब एक अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है सिर ढँकना और नक़ाब का मतलब है पूरी तरह से ढकना, जिसे बुरक़े के संदर्भ में समझा जा सकता है। बुरक़ा वह परिधान है जिसमें पूरा शरीर ढका होता है और सिर्फ़ आँखों से झाँकने के लिए एक जाली लगी होती है लेकिन हिजाब में चेहरा नज़र आता है मगर बाल और गर्दन छुपे होते हैं।

पश्चिमी देशों में महिलाएं हिजाब ज़्यादा पहनती है लेकिन बुरक़ा एशियाई देशों में ख़ासा प्रयोग में देखा जाता है, हालाँकि पश्चिमी देशों में भी कुछ इलाक़ों में मुस्लिम महिलाएँ बुरक़ा पहनना पसंद करती हैं। लेकिन आज सभी जगह बुरक़े का चलन बढ़ता जा रहा है और इसी को लेकर ब्रितानी कैबिनेट मंत्री जैक स्ट्रॉ ने अपने सुझाव दिए है कि- अगर कोई महिला बुरक़ा पहनकर उनसे बात करने आती है तो वह उससे बात करने में सहज महसूस नहीं करते इसलिए बुरक़ा हटाने पर ग़ौर किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर कोई मुस्लिम महिला हिजाब पहनती है जिसमें उसका चेहरा नज़र आ सकता है तो बातचीत ज़्यादा सहज तरीके से हो सकती है क्योंकि जिस महिला से बातचीत की जा रहा है उसके चेहरे के हावभाव को समझने में आसानी हो सकती है।

विद्वानों के अलग-अलग मतभेद

क़ुरआन में महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा गया है कि अपने अंगों को छुपाकर रखें और अपना श्रंगार या आभूषणों का दिखावा नहीं करें, “सिवाय उसके जो स्वभाविक रूप से नज़र आए।” इस्लामी विद्वानों में इस वाक्य के अंतिम हिस्से पर मतभेद हैं कि आख़िर इसका क्या मतलब निकाला जाए। क्या इसका यह मतलब किसी महिला के कपड़ों की बाहरी परत से है जिसके मतलब निकलता हो कि उसे ऐसा परिधान पहनना ज़रूरी है जो उसके पूरे शरीर को ढक ले और बुरक़ा या नक़ाब इसी श्रेणी में आते हैं।

क़ुरआन में कुछ और हिदायतें भी दी गई हैं जिन पर ख़ासी बहस हुई है। मसलन, महिलाओं को अपना वक्षस्थल ढकने की हिदायत दी गई है और अपने चारों और एक लबादा जैसा दुपट्टा या चादर भी पहनने को कहा गया है। लेकिन इन आदतों में मुस्लिम देशों में भी अंतर देखा गया है और इंडोनेशिया से लेकर मोरक्को तक मुस्लिम औरतों में इस मामले में कुछ अलग-अलग परंपराएँ देखी जाती हैं। लेकिन यह मुस्लिम महिलाओं पर ही छोड़ा जा सकता है कि वे इस बारे में क्या फ़ैसला लें, क्या वे अपने मज़हब और इस्लामी पहचान के तौर पर नक़ाब या बुरक़ा पहनना चाहें या नहीं।

फ्रांस और तुर्की जैसे देशों में धार्मिक परिधानों पर कुछ क़ानूनी पाबंदियाँ हैं तो महिलाओं के मामलों में यह उनका मानवाधिकार बन गया है कि वे क्या परिधान पहनें। लेकिन इसके साथ ही नक़ाब के बारे में ख़ासतौर से विकसित समाजों में बहुत से उदारवादी मुसलमानों को अक्सर ऐतराज़ करते हुए देखा जा सकता है जहाँ महिलाओं को सदियों से चली आ रही कुछ पाबंदियों को हटाने के लिए ख़ासी लंबी लड़ाई करनी पड़ी है।

सुझाव- किसी घर्म या जाति के लिए विशेष पोशाकों को नहीं बनाया गया है। कोई भी परिधान हमारी संस्कृति को दर्शा सकता है, इससे हमारे धर्म का कोई ताल्लुकात नहीं होना चाहिए। समाज को अपनी सोंच बदलनी होगी, तब महिलाओं के पोशाकों को चर्चा का विषय नहीं बनना पड़ेगा। 

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