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संपादकीय | बैंड , बाजा और बरात ….

संपादकीय | बैंड , बाजा और बरात ….

मध्य प्रदेश के दमोह जिले में बारात के बीच एंबुलेंस फंसने से एक डेढ़ साल की बच्ची की मौत हो गई। मानवता को शर्मसार करने देने वाली इस दुर्घटना के समय बच्ची के परिजन बारातियों से हाथ जोड़कर एंबुलेस को निकलने की विनती करते रहे और बारातियों ने सुना तक नहीं। दरअसल नंदरई पथरिया गांव में एक बच्ची को बिच्छू ने डंक मार दिया जिसे दमोह जिला चिकित्सालय लाया जा रहा था। एंबुलेंस बारात के जाम में फंसी और अस्पताल पहुंचते समय बच्ची की मौत हो गई।
6 दिसंबर की ये खबर बहुत सारे लोगों का ध्यान नहीं खींच पायी। या यूं कहें कि ढेढ़ साल की निर्दोष बच्ची की अकाल मौत भी अब हमें दुखी नहीं कर पाती। मीडिया के लिए भी शायद इस खबर में ऐसा कुछ नहीं था जो इस खबर को अखबार के पहले पन्ने पर जगह दिला पाता। कारण चाहे कुछ भी हो पर ये सवाल अपनी जगह मुस्तैदी से खड़ा है कि बारातों के ये जुलूस कब तक हिन्दुओं की शादियों का ज़रूरी हिस्सा बने रहेंगे ? आखिर राष्ट्रीय राजमार्गों से लेकर तंग बाज़ारों तक जुलूस की शकल में बरात निकाल कर हम कौन सा धार्मिक अनुष्ठान कर रहे होते हैं? क्या बरात और विवाह संस्कार का कोई अटूट सम्बन्ध है जिसके बिना विवाह संपन्न नहीं हो सकता ?
ये सच है कि इस बच्ची को ये बाराती मारना नहीं चाहते थे, पर ये भी तो सच है कि हर दिन कहीं ना कहीं कोई एम्बुलैंस सड़क जाम में फंस कर रह जाती है और मरीज़ अस्पताल ना पहुँच पाने के कारण दम तोड़ देते हैं। ये सच है की सड़क पर जाम लगने के और भी बहुत से कारण होते हैं पर बरात के जूलूस के कारण लगने वाले जाम को तो हम अवॉयड कर ही सकते हैं। हमारे देश में प्रगतिशील और समाज सुधारक लोगों ने समय समय पर बहुत से ऐसे रिवाजों को हटाया और संशोधित किया है जो अपनी उपयोगिता गँवा बैठे थे। आये दिन ऐसी शादियों के बारे में सुनने को मिलता है जो सादगी और तड़क भड़क के बिना बड़े पवित्र वातावरण में की जाती हैं।
तो क्या आज समय नहीं आ गया है की हम शादियों में निकाले जाने वाले जुलूसों के बारे में शांति से सोच विचार करें ? जिस तरह दहेज़ प्रथा के विरुद्ध काम किया जा रहा है उसी तरह से सादगी से की जाने वाली शादियों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता नहीं है क्या ? क्या सादगी से किये गए विवाह किसी भी तरह से कम कामयाब होंगे ? क्या बरात के जुलूसों में अपने घर की महिलाओं, बच्चों और बुजर्गों को हो सकने वाले नुकसान के बारे में नहीं सोचा जाना चाहिए ? हमारी ख़ुशी किसी और के दुःख का कारण बने तो क्या ये सही बात है ? बैंड , बाजा और घोड़ी के स्थान पर किसी और अच्छे विकल्प के बारे में सोच पाना क्या बहुत मुश्किल काम है ?
विवाह एक पवित्र संस्कार है जिस के द्वारा समाज दो लोगों को एक परिवार के रूप में जिंदगी शुरू करने का दायित्व देता है और ऐसे में दायित्व और आनन्द का एक सुन्दर संयोग बना कर हम इसे सेलीब्रेट किया करते हैं। समाज गवाह बने, आनंद से उत्सव मनावे और बाकी सारे दुनिया को कोई परेशानी भी ना हो तो भला इससे सुन्दर और क्या हो सकता है ? दमोह की इस डेढ़ साल की बच्ची की अकाल मृत्यु अगर हमें ये सन्देश दे पाए तो शायद हम स्वार्थी और संवेदना शून्य कहलाने से बच जाएँ। और हाँ एक और बात, बात पर हिन्दुओं को अपने रीति रिवाजों में कटौती या बदलाव की सलाह से बौखला जाने वालों से निवेदन है कि किसी और की बेवकूफी हमें मूर्ख बने रहने पर बाध्य कर दे तो फिर हम वाकई मूर्ख कहलाने के पात्र होंगे धन्यवाद।
आपका अपना,
अनिल कुमार

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Tuesday 23 जनवरी, 2018 19:07 PM