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अरविंद पांडे की कहानी- हादसे में दोनों हाँथ खो दिए लेकिन बाकी है जीने का जज्बा

अरविंद पांडे की कहानी- हादसे में दोनों हाँथ खो दिए लेकिन बाकी है जीने का जज्बा

गाजियाबाद। 4 साल पहले एक करंट हादसे में अपने दोनों हाथ गंवाने वाले अरविन्द पान्डे की कहानी आपको झकझोर कर रख देगी। एक ऐसा शख्स जो इतने बड़े हादसे के बाद भी टूटा नही बल्कि दोबारा मिली जिन्दगी के लिए भगवान को धन्यवाद देते हुए मस्ती से बम्हेटा के अस्पताल में चौकीदारी कर रहा है। 53 वर्षीय अरविंद पान्डे मूलरूप से फर्रुखाबाद के बाद रहने वाले हैं।

ये 10 साल पहले गाजियाबाद आये और एक ठेकेदार के यहाँ नौकरी करने लगे। ठेकदार इन्हें अपने साथ रखता था और जेबखर्च के साथ महीने के 5 हजार देता था। ठेकदार के साथ काम करते हुए वर्ष 2011 में बम्हेटा में नवीन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का उद्घाटन हुआ। ठेकदार ने इन्हें इसी स्वास्थ्य केंद्र में चौकीदारी की नौकरी दिला दी। तबसे अरविन्द यहीं बेहद ईमानदारी से चौकीदारी करने लगे।

अस्पताल प्रशासन अपनी तरफ से इन्हें हर महीने 8 से 10 हजार रूपये दे देता है। इसी से इनका परिवार चलता है। इन्हें घर भी अस्पताल की तरफ से दिया गया है। सुबह 10 बजे से लेकर शाम 3 बजे तक इनकी ड्यूटी यहीं रहती है। अरविन्द के 5 बच्चे हैं, दो बेटियों की शादी कर चुके हैं और बड़ा बेटा ठेले पर छोटी सी दुकान चलाता है व दो बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। बाप और बेटे के कमाए हुए पैसो से ही घर चल रहा है।

जिन्दगी ऐसे ही हंसते खेलते गुजर रही थी कि अचानक एक भयानक हादसे ने अरविंद की जिन्दगी एकदम बदल दी। जनवरी 2014 में पास में ही लगे ट्रांसफार्मर से इनके घर को जाने वाली लाइन में फाल्ट हो गया। बच्चों की जिद पर खुद ही लाइन सही करने लगे। अचानक ट्रांसफार्मर से लगे तारों में 11 हजार लाइन का करंट उतर गया। इसी के चपेट में आकर इन्होने अपने दोनों हाथ हमेशा के लिए खो दिए। इस हादसे से पूरी तरह उबरने में इन्हें 1 साल लग गया।

वर्तमान में अरविन्द पान्डे के दोनों हाथ नही हैं। अरविन्द बताते हैं कि इतना बड़ा हादसा होने के बाद इन्सान की हिम्मत टूट जाती है। लेकिन मेरे साथ ऐसा नही हुआ। अपने जीवन की इस तकलीफ में हमारे बच्चों ने हमेशा साथ दिया। मुझको कभी ये अहसास ही नहीं होने दिया कि मेरे साथ इतना बड़ा हादसा हुआ है।

अरविन्द आज भी इसी स्वास्थ्य केंद्र पर चौकीदारी कर रहे हैं। 24 घंटे में इनकी हर दैनिक जरूरत पर इनके बच्चे हमेशा साथ खड़े रहते हैं। बच्चों के इस प्यार को ही इन्होने अपनी ताकत बना रखा है। अरविंद को यकीन है जिस तरह इस बुरे वक्त में बच्चे साथ खड़े हैं, आने वाले वक्त में भी ये मेरे “हाथ” बनकर खड़े रहेंगे।

अरविन्द जैसे लोग जिन्दगी की विपरीत परिस्थितियों में खुद को इस तरह से मैनेज करते हैं कि उन्हें अपने दुःख का अहसास तक नही होता। शायद ऐसे ही लोग होते होंगें जिनसे सीखा जा सकता है कि “ये जिन्दगी न मिलेगी दोबारा” 

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