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पढ़िए कूड़ा उठाने वाले सफाई कर्मी का दर्द

पढ़िए कूड़ा उठाने वाले सफाई कर्मी का दर्द

गाज़ियाबाद। आपने अक्सर कूड़ा ढोने वाले रिक्शे वालों को अपने गली मोहल्ले में कूड़ा ढोते हुए देखा होगा। ये लोग कौन हैं और कैसी जिंदगी जीते हैं ये जानने के लिए हमारा गज़ियाबाद की टीम ने मुलाक़ात की ऐसे ही कूड़ा ढोने वाले बच्चन दास से। कोलकाता के थाना हुगलबदिया के अंतर्गत चसनिया गाँव के रहने वाले 27 वर्षीय बच्चन दास आज से 12 साल पहले अपने रिश्तेदार के कहने पर पैसे कमाने गाजियाबाद आये थे।

बच्चन दास कहते हैं कि हमारे गाँव में कोई रोजगार नही है, और न ही इतनी खेती है कि जीवन भर उसके भरोसे रहा जा सके। इसलिए हमारे गाँव का लगभग हर आदमी शहर पलायन करने को मजबूर है। इनके रिश्तेदार बहुत साल पहले से ही इस शहर में कूड़ा उठाने का काम कर रहे थे सो बच्चन दास भी उसी राह पर चल पड़े।

बच्चन दास ने बिना किसी पारिवारिक विरोध के प्रेम विवाह किया है। आजकल ये सिहानी चुंगी की झुग्गियों में अपनी एक बेटी और बीवी के साथ रह रहे हैं। लाईट ना होने के कारण रातों को झुग्गी में मोमबत्ती से ही काम चलाया जाता है। आसपास पीने का साफ़ पानी ना होने के कारण ये पानी खरीदकर पीते हैं जिसकी कीमत 300 रुपये महीना पड़ती है। नहाने धोने के लिए झुग्गी के बाहर लगा हैण्डपम्प है।

सुबह उठने से लेकर कूड़ा उठाने, छांटने, इकट्ठा कर ले जाने तक ये 12 घंटे काम करते हैं। इतनी मेहनत के बाद ये महीने का 15 हजार इकट्ठा तो करते हैं लेकिन उसमे से हर महीने 3 हजार गली के जमादार को देना पड़ता है। जिस झुग्गी में रहते हैं वो इन्होने खुद बनायी है पर जमीन के मालिक को 630 रूपये किराया देते हैं। राशन कार्ड बना नही है इसलिए मजबूरन बाजार से महंगा सामान खरीदना पड़ता है।

बच्चन बताते हैं कि इन्हें बैंक खाते से कोई मतलब नही क्यूंकि इतना पैसा बचता ही नही कि बैंक में जमा किया जा सके। जब कभी बच्चन दास या इनका परिवार बीमार पड़ता है तो इलाज के लिए झुग्गी के पास ही बने झोला छाप क्लिनिक से दवा लाते हैं। बड़ी या लम्बी बीमारी हो तो परिवार को इलाज के लिए गाँव भेज देते है।

बच्चों की ख़ुशी के और सेहत के लिये बाजार से फल और दूध भी लाकर कभी-कभी खा लेते हैं। इन्होने आधार कार्ड बनवाया था लेकिन वो कहीं गुम हो गया है और अब ये नहीं जानते कि कौन इनका आधार कार्ड बनाएगा। कूड़ा इकठ्ठा करना जितना मुश्किल काम है उससे ज्यादा मुश्किल इस कूड़े से निकाली गयी चीज़ों को बेचने में आती है। पालीथीन, ग्लास के टुकड़े आदि महज 2 रूपये किलो में बिकते हैं इसके अलावा बची हुई पानी की बोतलें, स्टील या टीन के केन 22 रूपये किलो में बेचते हैं।

खरीदने वाले आपस में मिले हुए हैं इसलिए वो अपनी मर्ज़ी के रेट में इनसे कूड़ा खरीदते हैं। ये लोग इस लूट का खुलकर विरोध भी नही कर पाते। बच्चन दास ने बताया इनके गाँव और बिरादरी के 20 से 30 घर के लोग कूड़ा उठाने के पेशे में लगे हैं। ज्यादातर दास उपजाति के लोग इस पेशे में शामिल हैं। इसके अलावा कुछ मुस्लिम लोग भी हैं जो ज्यादातर असम से आये हुए हैं क्यूंकि वहां भी बेरोजगारी की समस्या है।

तो इनकी कहानी जानने और आपको बताने के बाद “हमारा गाज़ियाबाद टीम” की आपसे यही अपेक्षा है कि इन लोगों के प्रति आप भी अपना नज़रिया बदलिए। हमारी नज़रों में ये लोग सही मायनों में ” स्वच्छ भारत अभियान ” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इन्हें इनके हिस्से का प्यार और सम्मान मिलना ही चाहिए। आप से विनती है की जब कभी आप घर का कूड़ा उठाने वाले को देखें तो उसे अहसास कराइए की वो भी एक सम्मानित कार्य कर रहा है और आप उसके काम को छोटा नहीं समझते।

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