ताज़ा खबर :
prev next

क्या आप जानते हैं पहली बार ट्रैफिक लाईट बनाने वाले का नाम ?

क्या आप जानते हैं पहली बार ट्रैफिक लाईट बनाने वाले का नाम ?

गाज़ियाबाद। सड़क पर आना-जाना तो हम हमेशा करते हैं। ट्रैफिक सिग्नल के लाल, पीले और हरे बत्ती के नियमों से भी हम अच्छी तरह से वाकिफ हैं लेकिन क्या हम ये जाते हैं कि ट्रैफिक लाईट का अविश्कार किसने किया था ? बता दें कि अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के गेरेट ऑगस्तस मॉर्गन ने आज जैसी ट्रैफिक लाइट्स का आविष्कार किया।

सिग्नल्स की शुरुआत पहले रेलगाड़ी के लिए हुई। दरअसल, पहले रेल के लिए सिंगल पटरी ही हुआ करती थी, जिस पर ट्रेन आया और जाया करती थी। रेल के आने-जाने का समय निर्धारित नहीं होता था, जिसके कारण दुर्घटना का खतरा निरंतर बना रहता था। इसीलिए सिग्नल लगाए गए। पर पुराने समय में सिग्नल ऐसे नहीं होते थे। ये तो बॉल और पतंग के आकार के होते थे। इसका मतलब यह हुआ कि यदि आकाश में पतंग दिखायी देती है तो खतरा है और बॉल दिखायी देती है तो रास्ता साफ है।

सन् 1841 में पहली बार लंदन रेलवे में आज के सिग्नल्स जैसे सिग्नल का प्रयोग किया गया। यह चौकोर आकार का था। यदि यह 45 डिग्री से नीचे हो तो यह इंजन के ड्राइवर को सावधानी के लिये संकेत होता था, और अगर ये आकाश की तरफ मुंह किए हो इसका मतलब होता था कि रास्ता बिल्कुल साफ है। इन सिग्नल्स पर लाल रंग का पेंट किया जाता था, जिससे ये ड्राइवर का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करें।

रात के लिए तेल के लैंप इन पर टांग दिए जाते थे। लाल रंग की लाइट होने पर रुकने का संकेत दिया जाता था, यदि सफेद लाइट हो तो ड्राइवर को रास्ता साफ होने का संकेत मिलता था। पर ये सिग्नल होने के बावजूद ट्रेन दुर्घटनाएं होती रहीं, इसीलिए सिग्नल सिस्टम में कुछ बदलाव किए गए। पहला बदलाव यह था कि गाड़ी को रोकने के लिये लाल रंग के संकेत का इस्तेमाल किया गया, इस बदलाव में एक विषेश बात यह रही कि इसमें पहली बार पीले रंग की रोशनी का इस्तेमाल किया गया, जो दर्शाती थी कि ड्राइवर अपना काम सावधानी पूर्वक चालू रखें। सन् 1893 में सफेद रोशनी की जगह हरे रंग की रोशनी का इस्तेमाल किया गया।

रेलवे में सिग्नल सिस्टम शुरू होने के बाद लंदन की सडम्कों पर भी ट्रैफिक सिग्नल सिस्टम को लागू किया गया। कार के आने से पहले सन् 1868 में ट्रैफिक लाइट का इस्तेमाल घोड़ागाड़ी, माल ढोने वाले रेहड़ों और पैदल चलने वाले यात्रियों के लिये होता था। तुम्हें जानकर हैरानी होगी कि यह सिग्नल एक लालटेन के रूप में होता था। इसमें लाल और हरे रंग का सिग्नल दिया जाता था। लाल का मतलब रुकना और हरे का मतलब सावधानी होता था। लालटेन गैस से जलायी जाती थी और ऐसी उपयुक्त जगह पर रखी जाती थी कि ट्रैफिक में आसानी से दिखायी दे सके।

जब अमेरिका और ब्रिटेन में कार आई तो इन सिग्नल्स से परेशानी होने लगी। तब मिशेगन के पुलिस ऑफिसर विलियम पोट्स ने सोचा कि इस समस्या से निपटने के लिये वह उन सिग्नल्स का प्रयोग करेंगे, जो रेलवे में होते हैं। सन् 1920 में पोट्स ने वुडवर्ड और मिशेगन की गलियों में पहली बार ऐसी ट्रैफिक लाइट का प्रयोग किया, जिसमें लाल और हरे रंग की बत्ती थी और उन्हें इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जोड़ा गया था। हालांकि तब भी सिग्नल देने के लिए हाथों से इशारे दिए जाते थे। पर ये भी ज्यादा सफल नहीं रहे, तब ओहियो के रहने वाले, अफ्रीकी-अमेरिकी मूल के गेरेट ऑगस्तस मॉर्गन ने आज जैसी ट्रैफिक लाइट्स का आविष्कार किया।

हमारा गाज़ियाबाद के एंड्राइड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैंआप हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो भी कर सकते हैं।