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सड़क पर भीख मांगते और बिलखते बच्चों की कराह, क्या यही है बाल दिवस..?

सड़क पर भीख मांगते और बिलखते बच्चों की कराह, क्या यही है बाल दिवस..?

गाज़ियाबाद। आज बाल दिवस है। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और बच्चे उन्हें चाचा नेहरू कह कर पुकारते थे। बाल दिवस बच्चों को समर्पित भारत का एक राष्ट्रीय त्योहार है।

वर्तमान में भारत के कई राज्यों में बच्चों के सपने सड़क पर बिखर रहे हैं । यूँ तो बाल दिवस बच्चों के लिए मनाया जाता है लेकिन कई ऐसे बच्चे हैं जिनकी जिंदगी सड़क पर भीख मांगते हुए गुजर रही है । पढ़ाई-लिखाई की दुनियां से वे बिलकुल अंजान हैं ।

गाज़ियाबाद के हापुड़ चुंगी चौराहे के पास गरीबी, बेबसी और लाचारी से जूझ रहे कई बच्चे देखे गए हैं । हापुड़ चुंगी का ये चौराहा ही इनको रोजी-रोटी देता है। सिग्नल पर खड़ी लम्बी कतार वाली गाड़ियों के बीच ही इन्हें चंद पैसे पाने की आस होती है। इन बच्चों के हांथों में या तो गुब्बारे होते हैं जिसे ये बेचा करते हैं या तो फटे कपड़ों के कुछ टुकड़े जिससे वे वाहनों को साफ करके उनसे रुपये लेते हैं या फिर खाली हाथ, जिसे फैलाकर वे लोगों से भीख मांगते हैं।

इस कड़ाके की ठण्ड में उनके तन पर कपड़े मात्र नाम के होते हैं। जहाँ वे अपना दिन ठिठुरते हांथों से भीख मांगकर पेट भरने में गुजारते हैं वहीँ रातें कचरे के ढेर से इकट्ठे किये बेकार कपड़ों से खुद को ढककर गुजारते हैं। इनके लिए ये  जरुरी नहीं होता कि हर दिन खाना मिल जाए, कभी-कभी इन्हें भूखे भी सोना पड़ता है।

जुकाम या बुखार होने पर इलाज के लिए इनके पास पैसे भी नहीं होते हैं जिसके कारण कई बच्चों की मौत हो जाती है। इन बच्चों की आँखों में सपने की जगह लाचारी के आंसू होते हैं। जो बच्चे खुद का पेट नहीं भर पाते वे पढ़ाई कहाँ से करेंगे ।  इनकी जिन्दगी झुग्गी-झोपड़ियों से शुरू होकर वहीँ ख़त्म हो जाती है । सब पढ़े -सब बढ़े को बढ़ावा देने वाली सरकार इन मासूमों के लिए योजनाएं तो चलाती है लेकिन बीच में बैठे अधिकारी इन बच्चों तक उनका हक पहुँचाने से पहले ही पचा लेते हैं।

सही मायनों में अगर हमे बालदिवस का मतलब समझना है तो सबसे पहले चौराहे पर खड़े इन बच्चों का दर्द समझना होगा वरना हर साल बाल दिवस का ढिंढोरा पीटने वाले बहुतेरे मिलते रहेंगे।

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