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फॉग से स्मॉग तक

ज्यादा दिन नहीं हुए जब सर्दियों के मौसम का इंतज़ार रहा करता था। मूंगफली, गज़क, गुलाबी धूप, शादियों का सीज़न, मक्के दी रोटी ते सरसों दा साग, गर्म शाल, रंगबिरंगे कार्डिगन, मफलर और गरम सूट जैसी चीजें ज़हन में एक अलग सी गरमाहट और उमंग भर दिया करती थीं। फ्लाइट्स और रेलगाड़ियों की लेट लतीफी भी होती थी, पर इन सब से डर नहीं लगता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से सर्दियों की फॉग ने, स्मॉग का डरावना रूप ले लिया है। अब सर्दियाँ आते ही स्मॉग की दानव सेना लोगों का दम घोटने आ खड़ी होती है।

अगर फॉग से बात हो सकती और कोई फॉग से यह पूछता कि आजकल आप स्मॉग बन कर क्यों आते हो तो हमें फॉग की मजबूरी और इंसानों की कारगुजारी बड़े आराम से समझ आ जाती। फॉग अपने बिगड़े हुए रूप के लिए आंसू बहाता और कहता कि भैया आप लोगों ने ही तो मेरा मुंह काला कर साँसों को जहरीला कर दिया है। इधर आप इंसानों की जरूरतें बढ़ती जा रही हैं और उधर मेरा चेहरा और सेहत बिगड़ती जा रही है। कुदरत ने इतना कुछ दिया है पर आप इंसानों के लिए वो कभी पूरा ही नहीं पड़ता। आप लोग कुदरत से जबरदस्ती छीन कर भोगना चाहते हो इसलिए कुदरत की दी हुई हवा, पानी और धूप को भी आप ने बर्बाद कर के रख दिया है।

अगर सीधे-सीधे बात की जाये तो “फॉग को स्मॉग” तक का सफ़र हमने ही कराया है। काला धुआं उगलती चिमनियाँ, सीमेंट और धूल उड़ाती निर्माणाधीन इमारतें, उजड़ती हरियाली, जलते टायर, पॉलिथीन, जलती पुराली और हमारी ऐसी ही सैकड़ों हरकतों से आज फॉग, स्मॉग बन गया है। हम अपने बच्चों का ही जीवन दूभर नहीं कर रहे बल्कि अपने नाती, पोतों और पड़पोतों के लिए तरह-तरह की बिमारियों के बीज भी बो रहे हैं। हमारे बच्चे अपनी पूरी उम्र तक जीवित रह पायें इस लायक माहौल भी अब हमने नहीं छोड़ा है।

तो संक्षेप में इतना ही कहना है कि बजाए सरकार, प्रशासन, पड़ोसी या बाकी सारी दुनिया को कोसने के बजाए हमें यह देखना होगा की हम इस स्मॉग को वापस फॉग में बदलने के लिए क्या कर सकते हैं। हम सभी के सामूहिक प्रयास से हमें शुद्ध हवा और पानी वापस मिल सकेगा। तो और देर न करके स्मॉग को फॉग तक का वापसी सफ़र कराना कैसा रहेगा?

सब अच्छा ही होगा, बस इसी आशा में
आपका
अनिल कुमार

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Thursday 23 नवंबर, 2017 12:58 PM