ताज़ा खबर :
prev next

बेटे की मौत से आहत पिता के दर्द की कहानी

बेटे की मौत से आहत पिता के दर्द की कहानी

गाज़ियाबाद। बुढ़ापे में अपने जवान बेटे को खोने के बाद हँसते-मुस्कुराते अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले महेन्द्र की कहानी बहुत कुछ बयाँ करती है। गाज़ियाबाद के बुलंदशहर इंडस्ट्रियल एरिया के एक कंम्पनी में डेयरी व कैंटीन में काम करने वाले 62 वर्षीय महेंद्र पटेल पिछले 16 साल से यहाँ काम कर रहे हैं। मूल रूप से ये बिहार के पूर्वी चंपारण मोतिहारी जिला के रहने वाले हैं। ये इसी कंपनी में रहते हुए यहाँ काम कर रहे हैं। इनके दो लड़के और एक लड़की हैं।

इनका बड़ा बेटा भी पहले एक कंपनी में काम करता था। लेकिन वर्ष 2016 में इनके बड़े बेटे के साथ एक दुर्घटना हो गई थी। नित्यक्रम के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं होने के कारण इन्हें खुले में ही जाना पड़ता था। एक दिन रेलवे ट्रैक के पास नित्यक्रम के लिए बैठे उनके बड़े बेटे को तेज रफ़्तार से आ रही ट्रेन ने अपनी चपेट में ले लिया। दुर्घटना में सर पर गहरी चोट लगने की वजह से उनके बेटे की मृत्यु हो गई। बड़े बेटे की मौत के बाद छोटे बेटे ने घर की जिम्मेदारियों को ठुकरा दिया और अलग रहने लगा। तब से लेकर आज तक घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी इनके कंधे पर ही है।

इनकी पत्नी और बहू गाँव में घर के कामों को देखते हुए खेती का भी काम करती हैं। इनकी बड़ी बहू के चार बच्चे 3 लड़की और 1 लड़का है। जिनके पालन-पोषण और पढ़ाई की जिम्मेदारी भी महेंद्र के कंधे पर है। यहाँ कंपनी में इन्हें  महीने की 8  हजार रुपये तनख्वाह मिलती है।  महीने का 1 हजार रुपये खर्च निकालकर वे अपनी सारी कमाई गाँव भिजवा देते हैं।

महेंद्र का कहना है कि कंपनी में रहने में  इन्हें कोई तकलीफ नहीं होती। इनका कहना है की कंपनी के मालिक अनिल गुप्ता इनकी हमेशा मदद करते हैं। इनके खाने-पीने और रहने का खर्चा नहीं लगता साथ ही पहनने के लिए कपड़े भी इन्हें कंपनी के तरफ से ही दी जाती है। तबियत ख़राब होने पर दवाइयों का खर्च भी इन्हें कंपनी के मालिक की सहायता से ही मिल जाता है।

जिस उम्र में आकर एक पिता की  चाह अपने नाती-पोते को गोद में खिलाने की होती है उस उम्र में महेंद्र अधेड़ शरीर से काम करके अपने परिवार को चला रहे हैं। अपनी ख्वाहिशों को इन्होंने अपने बड़े बेटे की चिता के साथ जला दिया और घर की जिम्मेदारियों को ही अपना सबकुछ मान लिया। ये हर वर्ष गाँव में दो से तीन बार ही जा पाते हैं। आगे इन्होंने बताया कि अब इनकी बस यही तमन्ना है कि ये जबतक जीवित रहेंगे अपने परिवार वालों को किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होने देंगे।

हमारा गाज़ियाबाद की टीम महेंद्र के जज्बे को सलाम करती है और आपसे ये निवेदन करती है कि आप हमेशा ऐसे लोगों की मदद करें।

हमारा गाज़ियाबाद के एंड्राइड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैंआप हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो भी कर सकते हैं।