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सिर्फ रिक्शा चलाकर बेटे को इंजीनियरिंग कराने वाले राधेश्याम की कहानी

सिर्फ रिक्शा चलाकर बेटे को इंजीनियरिंग कराने वाले राधेश्याम की कहानी

गाज़ियाबाद। ये कहानी है राधेश्याम की जो सुबह 8 बजे से लेकर पूरे 12 घंटे तक रिक्शा चलाने का काम करते हैं। 55 की उम्र में आने के बाद भी ये स्वस्थ् हैं और चेहरे पर बिना कोई शिकन लिए पूरी मस्ती से जिन्दगी जी रहे हैं। रिक्शा चलाकर इन्होने अपने बेटे को बीटेक कराया और बेटी को बीकॉम। आइये बताते हैं आपको राधेश्याम के 1980 से लेकर अब तक के सफर के बारे में। इनकी जिन्दगी के कुछ खट्टे-मीठे उतार चढ़ाव के बारे में जानने के लिए “हमारा गाजियाबाद” की टीम राधेश्याम से मिली।

मूलतः बनारस के रहने वाले राधेश्याम सन 1980 में गाजियाबाद आये थे। बनारस के एक गाँव में रहने वाले कास्तकार ने इनकी झुग्गी को उजाड़ दिया। जब घर उजड़ा तो ये महज 20 साल के थे, गरीब थे और इन्हें कोई कुछ बताने वाला नही था इसलिए घर उजड़ने का विरोध नही कर पाए। शादी हो चुके थी, परिवार का पेट भी पालना था इसलिए घर उजड़ने के बाद परिवार समेत दिल्ली जाने वाली ट्रेन पकड़ी और गाजियाबाद आ गए।

यहाँ आने के बाद काम ढूंढना शुरू किया और दो चार दिन बाद ही रिक्शा चलाने लग गये। राधेश्याम ने 10वीं तक की पढ़ाई की है। इनके तीन बच्चे हैं, दो बेटियों को बीकॉम कराया है और बेटे को बीटेक। बेटा आजकल 10 हजार की तनख्वाह पर काम कर रहा है। राधेश्याम हर रोज स्कूली बच्चों को लाते ले जाते हैं। बच्चों को लाने ले जाने के एवज में महीने का 2400 कमा लेते हैं।

राधेश्याम कविनगर इलाके में किराये पर रहते हैं जिसका किराया महीने का 4 हजार इनका बेटा ही वहन करता है। राधेश्याम अपने कमाए हुए पैसों से केवल घर का ही छोटा-मोटा खर्च चला पाते हैं। राधेश्याम के पास आधार कार्ड, वोटर आईडी कार्ड, बैंक खाता सबकुछ है। अपने बैंक खाते में इन्होने केवल 2 हजार रूपये ही डाल रखे हैं। राधेश्याम ने बताया कि जिन परिवारो के बच्चों को ये स्कूल लाते ले जाते हैं, वही लोग मुसीबत पड़ने पर थोड़ी बहुत मदद कर देते हैं।

राधेश्याम के साथ इनका परिवार भी अपनी हैसियत को समझता है इसलिए अपनी जरूरतों को ये लोग ज्यादा बढ़ावा नही देते। छोटा परिवार है इसलिए कभी ज्यादा की जरूरत भी इन्हें नही पड़ती। हमारी टीम को इतना कुछ बताने के बाद राधेश्याम को बस यही डर है कि इनके होनहार बेटे को इनके रिक्शे चलाने के पेशे को लेकर समाज कुछ न कहे। बाकी इनकी जिन्दगी मस्ती से चल रही है और आगे भी चलती रहेगी।

राधेश्याम ने बातचीत करते हुए यह भी बता दिया कि समाज हम जैसे रिक्शे वालों को ओछी नजरों से देखता हैं।

तो देखा आपने कि कोई भी काम कर के मस्ती से जीने वाले लोग हमारे आस पास ही हैं। ऐसे मेहनत कश और खुद्दार इंसान की कहानी पढ़ने के बाद कौन आदमी है जो इन्हें सम्मान और प्यार देना नहीं चाहेगा ?

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