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दूसरा विकल्प

स्टीफन आर कोवे की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक “सेवेन हेबिट्स ऑफ़ हाइली इफेक्टिव पीपल” में कोवे ने उन 7 आदतों के बारे में विस्तार से लिखा है जो सभी प्रभावी लोगों में आवश्यक रूप से होती हैं। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि अगर इन 7 आदतों को अपने जीवन में अपना लिया जाये तो आप बहुत प्रभावी व्यक्ति बन जाते हैं। इनमें से सबसे पहली आदत है “बीइंग प्रोएक्टिव”, यानि आगे बढ़कर एक्शन लेना या समस्या आने से पहले ही उसके लिए काम करना।

इस आदत के बारे में चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि हमारी जिन्दगी में दो अलग-अलग प्रकार के क्षेत्र होते हैं। पहले क्षेत्र का नाम है “एरिया ऑफ़ कंसर्न” यानि वो चीजें जिनकी हम परवाह करते हैं और दूसरा क्षेत्र है “एरिया ऑफ़ इन्फ्लुएंस” यानि वो चीजें या विषय, जिन पर हम कुछ कर सकते हैं।

संक्षेप में कहा जाये तो हमारे सामने दो विकल्प हो सकते हैं। पहला यह कि हम हर उस विषय पर सोचें, चिन्ता करें, बहस करें और परेशान होते रहें, जिनके बारे में हम कुछ नहीं कर सकते। आप समझ ही गए होंगे कि हम में से लगभग सभी लोग इस पहले विकल्प को अपना स्वभाव बना चुके हैं। हम लोग हर उस विषय पर टीका-टिप्पणी और बहस करते रहते हैं, जो किसी भी तरह से हमारे सामने आ जाता है। मेट्रो किराया, जाट आन्दोलन, बाबा राम रहीम, ताजमहल, जेएनयू, राहुल गाँधी, ममता बनर्जी, लालू यादव, नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सुनंदा पुष्कर, लव जिहाद, रोहिंग्या शरणार्थी, आइएसआई, पटाखों की बिक्री पर बैन, आरुषि मर्डर, निर्भया गैंग रेप, गोरखपुर में नवजात बच्चों की मौत, बढ़ती रेल दुर्घटनाएं, बुलेट ट्रेन, डोकलाम और ऐसे हजारों अन्य मुद्दों पर हम सभी घंटों की बहस में हिस्सा ले चुके हैं।

ये सारे मुद्दे हमारे “एरिया ऑफ़ कंसर्न” तो रहे पर क्या इन मुद्दों पर घंटों की बहस के बाद भी हम कोई प्रभाव डाल पाए? नहीं न! जब-जब, जो-जो हुआ वह होकर रहा और हमारे लाख चीखने-चिल्लाने के बाद भी अपनी ही तरह से हुआ।

हमारे पास दूसरा विकल्प भी हमेशा होता है और वह है कि हम अपने “एरिया ऑफ़ इन्फ्लुएंस” वाले विषयों पर अपने हिस्से का योगदान करें या एक्शन लें। ऊपर “एरिया ऑफ़ कंसर्न” वाले मुद्दों को आप दुबारा देखेंगे तो अपने आप समझ जायेंगे कि उपरोक्त वर्णित सभी मुद्दों पर हम कुछ नहीं कर पाए और न ही कुछ कर सकते थे। और यह बात हम सभी पहले से ही जानते होते हैं कि जिन मुद्दों पर हम परेशान हो रहे हैं या बहस कर रहे हैं, उन पर हमारा ज्यादा तो क्या जरा सा भी प्रभाव नहीं है। तो आज हमें सोचना होगा कि इस दूसरे विकल्प को क्यों न अपना लिया जाये, जिस किसी भी मुद्दे पर हम वास्तव में कुछ कर सकते हैं उस पर एक्शन लिया जाये और समस्या को समाप्त करने में न सही तो उसे कम करने में तो अपना योगदान दिया जाए। मसलन अगर हम अपने मोहल्ले या शहर की चार समस्याएँ चुनकर उन पर चर्चा करेंगे तो शायद उनका समाधान ही निकल आये।

तो आपके समक्ष दूसरा विकल्प अब मौजूद है जिसमें आप एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक की भूमिका में रहकर देश के निर्माण में अपना सहयोग दे पाएंगे और फालतू की बहस, टीका और टिप्पणी से बचे रहकर आपसी सौहार्द बढ़ा सकेंगे।

आपका
अनिल गुप्ता

By Alok Kushwaha : Thursday 23 नवंबर, 2017 12:57 PM