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धर्म से परहेज़ कब तक ?

कुछ दिन पहले वरिष्ठ पत्रकार मार्क टली ने कांग्रेस पार्टी को सलाह दी कि यदि कांग्रेस अपनी खोई हुई राजनैतिक जमीन वापस पाना चाहती है तो उसे गाँधी जी की तरह “धर्म और राजनीति” को जोड़ना होगा। उन्होंने कहा कि “कांग्रेस को अपनी राजनीति में धर्म के लिए जगह बनानी होगी”। हालाँकि कांग्रेस इंदिरा गाँधी के जमाने से ही इमामों और धर्मगुरुओं के आशीर्वाद के सहारे वोट बटोरती रही है, मगर मार्क टली के अनुसार “कांग्रेस जब धर्मनिरपेक्षता की बात करती है तो ऐसा लगता है कि वह धर्म विरोधी है”। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने आगे कहा कि “अधिकतर भारतीय धार्मिक हैं” और यही वजह है कि कांग्रेस को भी “बहुलतावादी धार्मिकता में लिपटे हुए राष्ट्रवाद को अपनाना चाहिए”। टली ने कहा कि “कांग्रेस और उसके आज के समर्थकों को लगता है कि अगर आप हिंदू धर्म या धर्म के बारे में कुछ बोल रहे हैं तो आप आरएसएस के हैं।”

मेरा यह मानना है कि मार्क टली ने हमारे सामने एक ऐसा विषय रखा है जिस पर हमारे नेता, पत्रकार, और बुद्धिजीवी आज तक चर्चा करने से बचते रहे। उनकी सारी चर्चाएँ इस घटिया विचारधारा में लिपटी रहती थी कि धर्म पर बात करने वाले साम्प्रदायिक होते हैं। जबकि सच यह है कि थोक के वोट पाने के लालच में सभी राजनैतिक पार्टियाँ मुल्ला-मौलवियों, साधुओं, पादरियों और धर्मगुरुओं को खुश करने में लगी रहती हैं।

टली की बात से मेरे ज़हन में एक बात आई है कि अब हमें धर्म और राजनीति के मिलन पर लगी वर्जना को हटाकर यह मान लेना चाहिए कि भारत जिस प्रकार एक कृषि प्रधान देश है, ठीक उसी तरह यह एक धर्म प्रधान देश भी है। यहाँ आस्तिक लोगों की संख्या नास्तिकों (एथीस्ट) से कहीं अधिक है। इसमें कोई शंका नहीं कि भारत की 90% जनता किसी न किसी धर्म या धार्मिक आस्था से पूरी तरह से जुड़ी हुई है, लेकिन विडंबना यह है कि हम धर्म ही पर चर्चा करने से बचते रहते हैं।

अब वक्त आ गया है कि हमें इस सत्य को स्वीकार कर अपने नेताओं को धर्म पर खुली चर्चा करने की आजादी दे देनी चाहिए। यदि ऐसा होता है तो राजनैतिक दलों को विभिन्न धर्मों या धार्मिक समूहों के प्रति अपनी कटिबद्धता या विरोध सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने की आज़ादी मिल जाएगी। इसका फायदा यह होगा कि सभी दल एक दूसरे पर साम्प्रदायिकता या तुष्टिकरण के आरोप लगाने के बजाए विभिन्न धर्मों के प्रति अपनी प्राथमिकताएं बताएंगे। राजनैतिक दल खुलकर बोलने पर विवश हो जायेंगे कि वे किस धर्म विशेष की किन कमियों का विरोध करते हैं और क्यों। उन्हें जनता को बताना होगा कि वे सड़क पर होती जुम्मे की नमाज़ों, आये दिन निकलती रथ यात्राओं, धार्मिक व राजनैतिक जुलूसों, कांवर यात्राओं को रोकने के लिए क्या करेंगे। उन्हें बताना होगा कि धार्मिक विश्वासों के चलते निरंतर बढ़ती जनसंख्या पर उनका क्या रुख है। उन्हें बताना होगा कि वे गौरक्षा के नाम पर हो रही अराजकता के पक्ष में हैं या बीफ फेस्टिवल्स के नाम पर होते उकसाने वाले समारोहों के पक्ष में। उन्हें बताना होगा कि किस धर्म की किस धार्मिक मान्यताओं की वजह से उनकी पार्टी अपने एजेंडा लागू नहीं कर पा रही है। उन्हें बताना होगा कि किस धार्मिक समूह का वोट पाने के लिए वे अपने राजनैतिक एजेंडा में फेरबदल के लिए तैयार हैं और कहाँ तक। हो सकता है एक पार्टी को किसी सम्प्रदाय के अनुयायियों के निरक्षर होने या फिर जनसंख्या नियंत्रण न कर पाने से आपत्ति हो। इस प्रकार देश हित और संविधान के अनुपालन में यदि किसी के धार्मिक विश्वास बाधा पहुंचाते हों तो राजनेताओं को साम्प्रदायिक कहलाने के डर से मुक्त होकर बोलने की आजादी होगी। चर्चा से सुधार और स्वीकारता आती है पर सांप्रदायिक शब्द का दुरुपयोग कर कुछ स्वार्थी लोगों ने धर्म को चर्चा से बाहर कर देने का षडयंत्र किया है। इसे समझना होगा।

जिस तरह एक डॉक्टर अपने मरीज को अच्छा करने के लिए दवाइयों के साथ-साथ परहेज़ भी बताता है, कोई शिक्षक अपने शिष्य को पाठ पढ़ाने के लिए उसे डांटता है या माँ -बाप अपने बच्चे की बुराइयों को दूर करने के लिए उसे डराते हैं, ठीक उसी तरह नेताओं को भी सभी भारतीयों को खुल कर बताना होगा कि बढ़ती जनसंख्या देश के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। आज हालत यह है कि सरकार की कमाई का एक तिहाई हिस्सा लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सब्सिडी देने में ही चला जाता है। जबकि यदि हम जनसंख्या पर नियंत्रण पा लें तो यही पैसा अस्पतालों और स्कूलों के विकास पर खर्च हो सकता है।

लेकिन यह तभी संभव हो पायेगा जब भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों को धर्म पर अपना पक्ष रखने और इसके पक्ष-विपक्ष में बोलने की आजादी होगी। धार्मिक विश्वासों पर निर्भीक राजनीतिक चर्चा कर के ही धर्म और सविंधान के उद्देश्यों को पूरा किया जा सकता है। हमारे राजनैतिक दलों को स्पष्ट रूप से उन मुद्दों धार्मिक मुद्दों पर अपनी राय रखनी होगी जो संविधान को लागू करने में आड़े आ रहे हैं। यदि ऐसा होगा तो मतदाताओं के समर्थन से सत्ता में आई पार्टी पर भी किसी धर्म विशेष के समर्थन, तुष्टिकरण या विरोध के आरोप नहीं लगेंगे। यदि ऐसा होगा तो टेलीविजन, समाचारपत्रों और सोशल मीडिया पर धर्म और राजनीति के विषयों पर अब तक बिना मकसद होती बहसों पर भी विराम लग जायेगा।

आपका अपना
अनिल गुप्ता

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Thursday 23 नवंबर, 2017 12:58 PM