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आखिर कब और कौन सुनेगा इन गरीबों का दर्द…

आखिर कब और कौन सुनेगा इन गरीबों का दर्द…

गाजियाबाद। अबकी बार खुशी का साथ बड़ा अजीब सा महसूस हुआ जब सुना कि हमारे आजाद भारत को 70 साल पूरे हो गये। ख़ुशी तो शायद पल भर की ही थी लेकिन अजीब ये सोच कर लगा कि क्यूँ हम आजादी का जश्न हर साल मनाते हैं जब भारत में आज भी 30 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे रहते हैं।

जब भी शहर में किसी ठेली वाले, रिक्शे वाले, दो वक्त की रोटी के लिए भीख मांगते बच्चे को देखता हूँ तो मन में अजीब सी कसक उठती है कि आखिर कौन और कब इनका दर्द सुनेगा। अभी हाल ही में मैंने एक कूड़ा बीनने वाले रामपाल से पूछा कि भाई क्यूँ करते हो ये काम? तो बेबस और लाचार बोल ही पड़ा की साहब कोई ऐसी दवाई बता दो कि मुझे भूख न लगे। जब इस पेट में भूख की आग पैदा होती है तो उसे बुझाने के लिए मजबूरी में कुछ भी करना पड़ता है।

ऐसे न जाने कितने रामदास, रामू और इनके बच्चे हैं जिनको हररोज कूड़ा बीनते, मजदूरी करते, जमीदारों की गुलामी करते, दर-दर की ठोकरे खाते देखता हूँ लेकिन कर कुछ नही पाता सिवाए उनको दो चार पैसे देने के। अरे ये तो कुछ भी नही पूस की उन रातों में जब हम अपने घरों में बैठकर ठंड से बचने के लिए तमाम संसाधन खोज रहे होते हैं उस वक्त किसी गरीब का बच्चा सड़क किनारे सिहर रहा होता है।

आखिर कौन सुने उसकी ये सिहरन, तड़प, बेबसी, लाचारी जो अपने हक के लिए जुबान तक नही खोल सकता। बड़ी-बड़ी कॉलोनी में और एसी में रहने वाले नेताओं की गाड़ियों की शीशे इनकी बेबसी देखने के लिए कभी नही गिरते। बस अपना वोट बैंक भरने के लिए ये अपने वक्त में इनके आगे गिडगिडाने पहुँच जाते हैं उसके बाद इन गरीबोँ के घर में मातम भी छा जाए तो उसको भी राजनीति का हिस्सा मान लेते हैं।

लोकसभा और राज्यसभा के चुनावों का जब दौर होता है तो कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा किसी की भी सरकार सत्ता में आनी हो, उसका तुच्चा सा नेता भी गरीबोँ की हक की बड़ी-बड़ी बाते करने लगता है। लेकिन ये भी सच है कि चुनाव के बाद इन गरीबोँ की सुनने वाला शायद ही कोई अदना सा नेता भी इनको इनका हक दिलाने के लिए सामने आना चाहता है। न जाने कितने गरीब बुजुर्ग वृद्धा पेंशन के लिए कचहरी के चक्कर हर रोज काटते रहे हैं लेकिन पेंशन की एवज में उन्हें अधिकारियों की लच्छेदार बाते मिलती हैं। लेकिन साहब! इन लच्छेदार बातों से गरीब की भूख नही मिटती।

सरकार आम जनता के लिए लाख योजनायें निकाले लेकिन जबतक नीचे बैठे चाटुकार और भ्रष्ट नेता व अधिकारी अपनी आदतों से बाज नही आयेंगे, कुछ नही हो सकता इस देश का। भारत में न जाने कितने गरीब दो वक्त की रोटी न मिलने से हर रोज भूखे मर जाते हैं, जिनकी खबर आसआस के इलाकों में भी नही हो पाती।

इन सारी बातों को कहने का मकसद सिर्फ एक ही था कि हम और आप बिना सिर पैर की बातों पर वक्त जाया करते हैं, न्यूज रूम में बैठकर बाबाओं पर बहस करते हैं लेकिन असल मुद्दों और इस देश की असलियत पर चर्चा करना कोई नही चाहता। अंत में कहना सिर्फ इतना है कि सभी मुद्दों से परे और असलियत में चर्चा करने का विषय आज की तारीख में गरीबी है। बुलेट और मेट्रो ट्रेन लाने से भारत का विकास नही हो सकता, असली विकास तो उनका करना है जो इन ट्रेनों में बैठने का अपना सपना साकार कर सकें।

ये लेखक के अपने विचार हैं..

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By सचिन गुप्ता : Saturday 21 अक्टूबर, 2017 23:21 PM