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कुछ खुद भी कर लो भाई

चाहे वह पार्क के कोने में बैठे बुजुर्ग हों या फिर सोशल मीडिया के बयानवीर, आजकल जिसे देखो राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर बेधड़क बयान और प्रतिक्रियाएं दे रहा है। कहीं रोहिंग्या मुसलमानों की दुर्दशा पर चर्चा हो रही है तो कहीं बलात्कारी बाबाओं पर। कोई बुलेट ट्रेन की बात कर रहा है, तो कुछ लोग जीएसटी का नफा-नुकसान गिनाने में लगे हैं। कुछ लोग सोशल मीडिया पर सरकार को ज्ञान देने में लगे हैं कि उन्हें देश कैसे चलाना चाहिए।

बेहतर तो यह होता कि ये बयानवीर उन विषयों के जानकार होते या फिर चर्चा में भाग लेने से पहले कुछ पढ़कर आये होते। तब इनकी बातों में भी नज़र आता। मगर अफ़सोस की बात है कि ज्यादातर लोगों की बातचीत का आधार किसी टीवी चैनल की बहस, व्हाट्स एप की पोस्ट या फिर समाचार पत्र में छपी खबर ही होती है।

गंभीरता से गौर करने पर मुझे इस बात का एहसास हुआ कि ये सभी बयानवीर और सोशल मीडिया के ज्ञानी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से भागने के लिए ही ऐसा कर रहे हैं। अगर ये सभी बयानवीर जिम्मेदार भी होते तो आज अपने आसपास की समस्याओं पर बहस कर रहे होते। मोहल्ले की गंदगी दूर करना इनकी चर्चाओं का विषय होता। कोई मोहल्ले के सार्वजनिक शौचालय को साफ़ रखने के सुझाव बता रहा होता, तो कोई सरकारी स्कूल को गोद लेकर उसे आधुनिक बनाने के उपाय सुझा रहा होता।

अक्सर इन बयानवीरों में वे लोग भी शामिल हैं, जो जल-भराव से टूटी सड़क की फोटो फेसबुक या ट्विटर पर डालकर नगर निगम को कोसते हैं, मगर अपने घर के रैम्प के कारण हो रहे जल भराव पर कुछ नहीं करते। ये वही लोग हैं जिन्हें लगता है कि बंद पड़ी स्ट्रीट लाईट, बिना नगर निगम में शिकायत करे अपने आप ही ठीक हो जानी चाहिए। सड़क पर टेंट लगाकर पारिवारिक समारोह करते ये लोग, ट्रैफिक जाम पर नियमित रूप से भाषण पेलते हैं। पार्कों की दुर्दशा पर चर्चा करनी हो तो इनसे बढ़कर कोई नहीं, मगर पार्कों में जागरण और शादियों का आयोजन करते लोगों के विरुद्ध ये कुछ नहीं करते हैं।

अपने गाज़ियाबाद में हम अक्सर सड़क के किनारे लोगों को पेशाब करते पाते हैं। इन्हें देखकर हम अपनी बहन बेटियों के साथ नज़रें झुकाते हुए चुपचाप निकल जाते हैं। मगर, क्या हमने कभी यह जानने कि कोशिश की है कि हमारी कॉलोनी के सार्वजनिक शौचालय किस हालत में हैं? शायद यही कारण है कि गाज़ियाबाद की सबसे पॉश कहे जाने वाले राज नगर इलाके में स्थित सेंट्रल पार्क का महिला शौचालय अपनी दुर्दशा पर रो रहा है।

आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि शहर में कुल 150 से भी ज्यादा सार्वजनिक शौचालय हैं। जिनमें आधे से भी ज्यादा बदहाल हैं। हमारा गाज़ियाबाद की टीम द्वारा अभी तक गाज़ियाबाद के 30 से भी ज्यादा सार्वजनिक शौचालयों का निरीक्षण किया जा चुका है। इनमें से 12 टॉयलेट तो सही हालत में हैं, मगर बाकी सारे भगवान भरोसे पड़े हैं। कुछ पर दबंगों ने कब्ज़ा कर रखा है तो कुछ गरीबों का ठिकाना बने हुए हैं। राठी मील के पास बने एक सार्वजनिक शौचालय में तो केयर-टेकर अपने पूरे परिवार के साथ रह रहा है। इस टॉयलेट के अन्दर घुसते ही आपको पूरा घर का माहौल मिलेगा। यहाँ वह बाकायदा सरकारी मीटर पर टीवी, पंखे और फ्रिज सभी कुछ चला रहा है।

यदि आप अपने घर के सामने की सड़क साफ़ रखेंगे तो पूरा शहर साफ़ हो जायेगा। कुछ ऐसा ही गाँधी जी ने बरसों पहले कहा था, जो आज भी प्रासंगिक है। अगर देश का हर नागरिक अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने आस-पास की समस्याओं को दूर करने के लिए काम करे, एक्शन ले तो सरकार और प्रशासन को कोसने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

बेहतर होगा कि हम बे-मकसद बहस करने के बजाए वे काम करें जिनसे समस्याएं दूर हो सकती हैं और जिन्हें करना हमारे वश में हो। यह कहना गलत नहीं होगा कि शहर गंदे नहीं होते बल्कि शहर के लोग गंदगी दूर करने के लिए कुछ नहीं कर रहे होते हैं। आज हमें तय करना है कि हम समस्याओं पर चर्चा करते रहेंगे या समस्याओं को समाप्त करेंगे। निर्णय कीजिए और देखिये कि आप दुनिया के सबसे अच्छे शहर में रह रहे होंगे और बाकी शहरों के लोगों के लिए आप मिसाल बनेंगे।

धन्यवाद
आपका अपना
अनिल गुप्ता

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Saturday 21 अक्टूबर, 2017 23:22 PM Updated