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शहरों से गायब होते मेहनतकश,कहानी गाज़ियाबाद के रिक्शेवालों की

शहरों से गायब होते मेहनतकश,कहानी गाज़ियाबाद के रिक्शेवालों की

गाज़ियाबाद। कड़ी धूप में भी पैडल मारते पैर, पसीने से तर-बतर शरीर, सवारियों का इन्तजार करती निगाहें। यह सब कोई फ़िल्मी सीन नहीं बल्कि शहर में कुछ साल पहले सैकड़ों की संख्या में पाए जाने वाले रिक्शेवालों की दशा है। ऑटो और कार सहित सार्वजनिक सवारियों के रूप में उबर, ओला जैसी कंपनियों के आने बाद जिनके बारे में हम लगभग भूल चुके हैं यह उनकी कहानी है।

करीब 5 साल पहले के शहर को देखिये, गली, चौराहों, नुक्कड़ों पर आपको दो चार रिक्शेवाले खड़े दिख जाते थे। जब तक शहरों में ऑटो चलने शुरू नहीं हुए तब तक ये रिक्शे गरीबों के घर का सहारा बनते रहे। लेकिन जब शहरों में ऑटो और सार्जनिक यातायात के साधनों की हनक बढ़ी तो ये मजबूर होकर बंद होने लगे।

जो रिक्शेवाले आर्थिक रूप में मजबूत थे उन्होंने तो ऑटो खरीद लिया लेकिन जो मजबूर थे उन्होंने छोटे शहरों के गली-मुहल्लों की राह पकड़ ली। कुछ इन्ही कहानियों के साथ आपको मिलवाते हैं गाज़ियाबाद में रिक्शा चलाने वाले लोगों से और जानते हैं उनकी परेशानियों को। अक्सर आप आरडीसीवाले फ्लाईओवर से पुराने बसअड्डे की तरफ रात को जाएं तो ये लोग आपको सड़क के किनारे अपने रिक्शे पर ही रात गुजारते मिल जायेंगे।

रिक्शा चलाने वाले नरेश बताते हैं, वो बिहार के मोतिहारी के रहने वाले हैं। करीब 15 साल पहले वो गाज़ियाबाद आए और रिक्शा चलाना शुरू किया। शुरू के पांच-छह साल तो आराम से गुजरे, पूरे गाज़ियाबाद का चक्कर लगाते थे। आमदनी भी अच्छी खासी हो जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे शहर में ऑटो बढ़ने लगे और सवारियां मिलना बंद होने लगी। लेकिन अपने परिवार का पेट पालना था तो फिर उन्होंने केवल राजनगर में ही रिक्शा चलाना शुरू किया।

हरीश यूपी के बलिया के रहने वाले हैं, करीब 20 साल पहले गज़ियाबाद आए थे, कई फैक्ट्रियों में काम किया। कुछ सालों के बाद रिक्शा चलाना शुरू किया। पुराना बस अड्डे पर सवारियों का इन्तजार करते  हरीश कहते हैं कि अब सवारियां मिलनी कम हो गई हैं। ऑटो चलने की वजह से रोजी रोटी पर प्रभाव पड़ा है लेकिन शाम तक परिवार का पेट पालने तक की बचत हो जाती है।

इसी तरह से रज्जन को बिहार से गाज़ियाबाद आए करीब 15 साल हो चुके हैं वो भी रिक्शा चलाते हैं। लेकिन अब तक अपना ठिकाना नहीं बना पाए हैं। पूरे दिन वो रिक्शा चलाते हैं और शाम को किसी फ्लाईओवर के नीचे रिक्शे पर ही रात गुजारते हैं। महीने के अंत में अपनी कमाई की बचत को घर भेजते हैं जिससे कि घर वालों का गुजारा होता है।

इसी तरह से गज़ियाबाद में सैकड़ों रिक्शेवाले हैं जो कि दूसरे राज्यों से यहाँ आकर रह रहे हैं।  इन्हें न तो सरकार से कोई मतलब है और न ही राजनीति से अगर कोई सहायता मिल जाती है तो भी ठीक है और अगर न मिले तो इन्हें कोई अफ़सोस नहीं। ये रिक्शा चला कर अपना गुजारा करते हैं और अपने परिवार का पेट पालते हैं। हालाँकि ऑटो के बढ़ जाने से इनके धंधे में मंदी आई है लेकिन फिर भी ये अपनी गरीबी और बदहाली को पीछे धकेल कर अपना पेट पाल रहे हैं।

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