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दहेज प्रथा के खिलाफ उठते युवाओं के कदम

दहेज प्रथा के खिलाफ उठते युवाओं के कदम

गाज़ियाबाद । दहेज वर्तमान समय में समाज का के लिए न केवल एक अभिशाप है बल्कि सम्पूर्ण मानवजाति को शर्मसार करने वाली एक भ्रष्ट परंपरा है। जहां पहले दहेज इस उद्धेश्य से दिया जाता था कि वे अपनी बेटी को खाली हाँथ विदा नहीं करेंगे । वहीं आज के युग में दहेज मांगर ही शादी की जाती है और दहेज न दिये जाने या कम दिये जाने पर या तो बहू को प्रताड़ित किया जाता हैए जबरदस्ती मार दिया जाता है या वो खुद इन लोभियों से तंग आकर मौत को अपने गले लगा लेती है।

बता दें कि देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है और वर्ष 2007 से 2011 के बीच इस प्रकार के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों से वर्ष 2012 में दहेज हत्या के 8,233 मामले सामने आए। आंकड़ों का औसत बताता है कि प्रत्येक घंटे में एक महिला दहेज की बलि चढ़ रही है।

दहेज प्रथा संबंधी कानून

.दहेज निषेध अधिनियमए 1961 के अनुसार दहेज लेनेए देने या इसके लेन.देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।

.दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित हैए इसके अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।

.यदि वे लड़की के स्त्रीधन को उसे सौंपने से मना करते हैं तो धारा 406 के अन्तर्गत लड़की के पति और ससुराल वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों हो सकता है।

.यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता थाए तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304.बी के अन्तर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।

भारतीय संविधान में दहेज के निषेध के लिये इतना सख्त कानून बनने के बाद भी दहेज के कारण महिलाओं की होने वाली मृत्यु पर नियंत्रण नहीं पाया गया है। इतना ही नहीं इस संबंध में कानून व्यवस्था में लचीलापन बरतने के कारण दहेज के लोभियों को और बढ़ावा मिलता है। दहेज न देने पर बहू को मौत के घाट उतारने वाले दहेज के लोभी रूपयों का धौंस दिखाकर कानून को भी अपनी मुट्ठी में कैद कर लेते हैं और हमारा कानून रूपयों की लालच में स्वयं को बेचकर बेगुनाह लाशों की फाइल को अपने कुकर्मो की तिजोरी में बंद कर देते है। उसके बाद उस फाइल की तरफ किसी की नजर नहीं जाती बल्कि उसके स्थान पर दहेज के कारण होने वाली महिलाओं के मौत का एक और फाइल तैयार हो जाता है और कुछ दिन बाद वो भी किसी इसी किसी चापलूसी और भ्रष्टाचारी के हांथों कैद कर ली जाती है।

दहेज प्रथा के खिलाफ उठाए गए कुछ युवाओं के कदम

ऐसे में कुछ युवा लड़को व लड़कियों द्वारा दहेज प्रथा को मिटाने के लिये आत्मनिर्भर बनने का फैसला लिया है और साथ ही स्वयं के पसंद का जीवनसाथी चुनकर दहेज लोभियों के झूठे गूरूर को मिट्टी में मिलाने का फैसला लिया है।

इस संबंध में हमारा गाज़ियाबाद की टीम ने बुलंदशहर इंडस्ट्रियल एरिया के बीए फब्रिकेटर्स कंपनी में काम करने वाले कुछ जागरूक युवाओं का एक इंटरव्यू लिया। दहेज प्रथा को बंद करने के उपाय के बारे में जानने के लिये टीम ने उनसे कुछ सवाल किये। जिसमें शास्त्रीनगर में रहने वाली चांदनी का कहना है कि उनके घर वाले दहेज प्रथा के बिल्कुल खिलाफ है। उनका मानना है कि अगर लड़कियां आत्म निर्भर बन जाए तो वे अपना जीवन साथी स्वयं ढूंढ सकती हैं। साथ ही दहेज प्रथा पर भी नियंत्रण पाया जा सकता है।

वहीं शास्त्रीनगर की ही रहने वाली पाखी का कहना है कि उन्होंने संकल्प लिया है कि वे दहेज देकर शादी नहीं करेंगी और ना ही अपने परिवार के किसी लड़के को दहेज लेने देंगी। वे अपनी छोटी बहनों की शादी भी बिना दहेज के करवाना चाहती है। साथ ही उनका ये भी कहना है कि जितना दहेज लड़की के घर वाले लड़के वालों को देते हैं उतना अगर वे अपनी बेटी के भविष्य को संवारने में लगाए तो उनकी बेटी उससे भी ज्यादा बेहतर जिन्दगी जी सकती है।

उसी कंपनी में अकाउंटिंग में काम करने वाली ज्योत्सना का कहना है कि दहेज प्रथा को बढ़ावा देने में लड़की के घरवालों का ही हांथ होता हैए यदि लड़कि के घरवाले दहेज देना बंद कर दें तो शायद दहेज प्रथा पर नियंत्रण पाया जा सकता है। साथ ही हम युवाओं को भी ये संकल्प लेना चाहिये कि वे दहेज न देकर शादी करेंगे और ना लेकर।

ज्योत्सना के साथ अकाउंट आॅफिस में बैठने वाली रेनूका का कहना है कि वे भी दहेज देकर शादी नहीं करना चाहती । वे आत्मनिर्भर हो अपनी जिन्दगी जीना चाहती हैं। साथ ही समाज में अपना एक अलग पहचान बनाना चाहती हैं।

वहीं अगर हम बात करें युवाओं की तो इसी कंपनी में काम करने वाले सचिन का कहना है कि दहेज प्रथा को लेकर जो विचारधारा हमारे समाज के लोगों की है, आज उसे बदलने की जरूरत है। क्यूंकि जितना खर्च लड़के के घर वाले अपने बेटे को पढ़ाने में करते हैं उतना ही खर्च लड़की के घर वाले अपनी बेटी को पढ़ाने में करते हैं। हालांकि इनके माता पिता ढ़ेर सारा दहेज लेना अपना अधिकार समझाते हैं लेकिन सचिन ने ये संकल्प लिया है कि वे अपनी पसंद की लड़की से बिना दहेज लिये शादी करेंगे ।

सचिन के ही खास दोस्त धीरज का कहना है कि वे समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहते हैं। इनका ये भी कहना है कि जबतक वे अपने बलबूते सही तरीके से अपनी जिन्दगी नहीं  जीने लगते तबतक वे शादी नहीं करेंगे। और अगर इन्होंने शादी करने का निर्णय लिया भी तो वे दहेज नहीं लेंगे।

दहेज प्रथा को खत्म करने और दहेज के लोभियों का गुरुर को चूर-चूर करने के लिये इन युवाओं के तरफ से उठाए जाने वाले कदम न केवल सराहनीय है बल्कि देश के हर युवाओं के लिए प्रेरणा का श्रोत है । हमें भी दहेज को कम करने या खत्म करने के लिये एक ठोस कदम अवश्य उठाना चाहिये।

हमारा गाज़ियाबाद की टीम इन जागरूक युवाओं के जज्बे को सलाम करती है।

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By प्रगति शर्मा : Tuesday 26 सितंबर, 2017 02:14 AM