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जानिए रोहिंग्या मुसलमानों को क्यों शरण नहीं देना चाहती भारत सरकार

जानिए रोहिंग्या मुसलमानों को क्यों शरण नहीं देना चाहती भारत सरकार

भारत। म्यांमार से बड़ी तादाद में खदेड़े जा रहे रोहिंग्या मुसलमान छोटी-छोटी नावों में भरकर समुद्र के रास्ते आ रहे हैं। नाव नहीं मिली तो गले तक पानी में चलकर आने को मजबूर हैं। करीब तीन लाख रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश में शरण लेने पहुंचे हैं।  खाने के सामान और राहत सामग्री की यहां भारी कमी है। इन हालात में बच्चे और बूढ़े सबसे ज़्यादा परेशान हैं। इन्होंने बांग्लादेश के शामलापुर और कॉक्स बाज़ार में शरण ली हैं।

बांग्लादेश में इनकी जान बची हुई है, लेकिन मुसीबतों की कमी नहीं है। कॉक्स बाज़ार फिलहाल इन शरणार्थियों का घर बना हुआ है। भूखे लोगों के पास न खाना, न पैसे और न ही पहनने को कपड़े हैं। भीड़ यहां खाने के पैकेट और राहत सामग्री के लिए टूट पड़ती है। म्यांमार में 25 अगस्त को भड़की हिंसा में क़रीब 400 मौतों की ख़बर है।

म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यक हैं और ये रोहिंग्या को अप्रवासी मानते हैं। साल 2012 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या-बौद्धों के बीच भारी हिंसा हुई थी। साल 2015 में भी रोहिंग्या मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन शुरू हुआ।

कई मानवाधिकार संगठन भारत सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि इन शरणार्थियों को देश में ही रहने दिया जाए वहीं सरकार का मानना है कि रोहिंग्या मुसलमान अवैध प्रवासी हैं और इसलिए कानून के मुताबिक उन्हें बाहर किया जाना चाहिए। अब ये मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है। गृह मंत्रालय कह चुका है कि वह रोहिंग्या मुसलमानों को भारत में शरण नहीं देगा, बल्कि उन्हें वापस लौटा देगा। इसके साथ ही भारत-म्यांमार सीमा पर चौकसी बढ़ा दी गई है। सीमा पर सरकार ने रेड अलर्ट जारी किया है।

रोहिंग्या समुदाय 12वीं सदी के शुरुआती दशक में म्यांमार के रखाइन इलाके में आकर बस तो गया, लेकिन स्थानीय बौद्ध बहुसंख्यक समुदाय ने उन्हें आज तक नहीं अपनाया है। 2012 में रखाइन में कुछ सुरक्षाकर्मियों की हत्या के बाद रोहिंग्या और सुरक्षाकर्मियों के बीच व्यापक हिंसा भड़क गई।

तब से म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के खिलाफ हिंसा जारी है।रोहिंग्या और म्यांमार के सुरक्षा बल एक-दूसरे पर अत्याचार करने का आरोप लगा रहे हैं। ताजा मामला 25 अगस्त को हुआ, जिसमें रोहिंग्या मुसलमानों ने पुलिस वालों पर हमला कर दिया। इस लड़ाई में कई पुलिस वाले घायल हुए, इस हिंसा से म्यांमार के हालात और भी खराब हो गए।

भारत में करीब 40 हजार रोहिंग्या मुसलमान हैं, जो जम्मू, हैदराबाद, दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में मौजूद हैं। चूंकि भारत ने शरणार्थियों को लेकर हुई संयुक्त राष्ट्र की 1951 शरणार्थी संधि और 1967 में लाए गए प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इसलिए देश में कोई शरणार्थी कानून नहीं हैं।

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने कहा था कि मैं यह बात साफ कर दूं कि रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं और भारतीय नागरिक नहीं हैं। इसलिए वे किसी चीज के हकदार नहीं हैं, जिसका कि कोई आम भारतीय नागरिक हकदार है। उन्होंने रोहिंग्या मुस्लिमों के निर्वासन पर संसद में दिए गए अपने बयान पर कहा कि रोहिंग्या लोगों को निकालना पूरी तरह से कानूनी स्थिति पर आधारित है।

उन्होंने कहा, रोहिंग्या अवैध प्रवासी हैं और कानून के मुताबिक उन्हें निर्वासित होना है, इसलिए हमने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे रोहिंग्या मुस्लिमों की पहचान के लिए कार्यबल गठित करें और उनके निर्वासन की प्रक्रिया शुरू करें। हालांकि उन्होंने कहा कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है, जहां लोकतांत्रिक परंपरा है। उन्होंने कहा, हम उन्हें समुद्र में फेंकने या गोली मारने नहीं जा रहे हैं। हम पर क्यों बहुत अमानवीय होने का आरोप लगाया जा रहा है।

बांग्लादेश म्यांमार में जारी नरसंहार के कारण वहां से भागकर आए हजारों रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के लिए एक नये शिविर की खातिर जमीन देने पर सहमत हो गया है। बांग्लादेश के विदेश राज्य मंत्री मोहम्मद शहरयार आलम ने यह जानकारी दी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार नये शिविर से बांग्लादेश के सीमाई जिले कॉक्स बाजार में मौजूदा शिविरों से थोड़ा दबाव हटाने में मदद मिलेगी जहां 25 अगस्त के बाद से 3,13,000 रोहिंग्या पहुंच चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी की प्रवक्ता विवियन टैन ने कहा कि रोहिंग्याओं के दो शरणार्थी शिविरों में क्षमता से कहीं ज्यादा लोग रह रहे हैं।

 

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