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रास नहीं आते हमें इमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी

गाज़ियाबाद में पिछले हफ्ते हुई कुछ घटनाओं पर नज़र डालें तो उनमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गाज़ियाबाद आना और उसी शाम जिलाधिकारी मिनिस्ती एस. नायर का लम्बी छुट्टी पर चले जाना प्रमुख थीं। हालाँकि मिनिस्ती की छुट्टियों का कारण उनका ख़राब स्वास्थ्य बताया जा रहा था, मगर उनके ट्रान्सफर ने यह सिद्ध कर दिया कि गाज़ियाबाद की आबोहवा उन्हें रास नहीं आ रही थी। या यूँ कहें कि गाज़ियाबाद की राजनीति और प्रशासन पर हावी कुछ सफेदपोशों, नेताओं, अधिकारियों और दलालनुमा पत्रकारों को उनकी गाज़ियाबाद में मौजूदगी रास नहीं आ रही थी।

और हो भी क्यों नहीं। किसानों को अपनी अधिग्रहित जमीन का मुआवजा लेने के लिए सालों इंतज़ार करना पड़ता था। मिनिस्ती ने इस परंपरा को तोड़ते हुए अपने कार्यकाल में रिकॉर्ड मुआवज़े बाटें। इसके लिए राज्य सचिवालय में उनके सम्बन्ध और अनुभव, दोनों ही गाज़ियाबाद के निवासियों के लिए बहुत काम आए। अपने गाज़ियाबाद के प्रवास के दौरान शायद ही कोई ऐसा दिन बीता होगा जिसमें मिनिस्ती ने किसी भू-माफिया के कब्जे से बहुमूल्य सरकारी भूमि मुक्त न करवाई हो। यही कारण था कि शहर के भू-माफियाओं और उनके संरक्षकों को मिनिस्ती की मौजूदगी आँखों में खटक रही थी।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी गाज़ियाबाद में उनका योगदान अतुलनीय रहा। समाज के विभिन्न वर्गों की महिलाओं को आपस में जोड़ कर उन्होंने अनेक स्वयं सहायता समूहों (सेल्फ हेल्प ग्रुप्स) का गठन किया। उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं के अंतर्गत ऋण दिलवाए जिसकी बदौलत आज ये महिलाएं अपने पैरों पर खड़े होकर एक इज्जतदार जिन्दगी जी रही हैं। भले ही मिनिस्ती पर नेताओं के फोन न उठाने के आरोप लगे हों, मगर आम जनता की परेशानी सुनने और उनके तत्काल समाधान निकालने की शैली ने उन्हें आम जनता के बीच मशहूर कर दिया था। ये कुछ ऐसे काम थे जिनके बारे में गाज़ियाबाद की जनता बखूबी जानती थी। मगर परदे के पीछे उन्होंने जिला प्रशासन में मौजूद कई भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं की रोजी रोटी बंद कर दी थी। खैर जाने-अनजाने कारणों से विरोधी खेमा सफल हुआ और अंततः उनका गाज़ियाबाद से ट्रान्सफर हो ही गया।

एक ईमानदार अधिकारी का यूँ इस तरह, चुपचाप और इतनी जल्दी ट्रान्सफर हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। आश्चर्य और अफ़सोस की बात यह है कि उनके गाज़ियाबाद छोड़ने के बाद गाज़ियाबाद की जनता ने न तो कोई प्रतिक्रिया दिखाई और न ही गाज़ियाबाद के अख़बारों ने। शहर में तैनात गिने-चुने ईमानदार अधिकारियों ने दबे स्वर में ही सही, मगर मिनिस्ती के जाने पर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दिखाई। अपने आला अधिकारियों से बैर न लेने का उनका कारण समझ आता है मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ सोशल मीडिया को रंगने वाला गाज़ियाबाद का युवा वर्ग भी शांत ही रहा। मानो उस पर कोई असर ही न पड़ा हो। कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि हम अपने चारों ओर फैले भ्रष्टाचार और अनियमितता के इतने आदि हो चुके हैं कि हमने अच्छाई की कदर करना ही छोड़ दिया हो।

हमारे चारों और हर रोज़ दर्जनों अच्छी घटनाएँ होती हैं। कहीं कोई किसी बेसहारा को छत देने में मदद कर रहा है तो कहीं कोई बलात्कार या यौन शोषण की शिकार किसी महिला या बच्चे का मार्गदर्शन कर रहा है। गाज़ियाबाद में भी जगह-जगह नेकी की दीवारें नज़र आने लगी हैं। जहाँ लोग अपने पुराने और इस्तेमाल में न आने वाले कपड़े टांग देते हैं ताकि जरूरतमंदों के काम आ सकें। बहुत सी संस्थाएं जेल में बंद लोगों को हुनर सिखाकर उन्हें समाज में इज्जतदार जिन्दगी जीने का अवसर प्रदान कर रही हैं, तो बहुत से उद्यमी अपने संस्थानों में काम कर रहे अनपढ़ मजदूरों और उनके बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा उठाए हुए हैं।

आज समाज का यह फर्ज है कि वह ऐसी नेक संस्थाओं और व्यक्तियों को खोजकर उनके नेक कामों की सार्वजानिक रूप से सराहना करे। हाँ इनमें से बहुत से लोग परदे के पीछे रहकर ही काम करना पसंद करते हैं, प्रसिद्धि की अभिलाषा किए बिना चुपचाप ही मदद करते रहते हैं। लेकिन हमें इन लोगों के बारे में भी दुनिया को बताना होगा ताकि समाज के अन्य लोग भी इनसे प्रेरणा लेकर आगे आएं।

अच्छे की सराहना और बुरे की निंदा कर के ही समाज को बेहतर बनाया जा सकता है और मुझे पूरी आशा और विश्वास है कि जनता अपना ये धर्म एक बार फिर से निभाएगी। अच्छे अफसर को शहर में बनाये रखना हमारी भी ज़िम्मेदारी है ये बात अब सभी को समझनी होगी।

“हमारा गाज़ियाबाद” न्यूज़ पोर्टल के माध्यम से हमारा हमेशा से ही यह प्रयास रहा है कि काजल की इस कोठरी में भी अपना दामन बचाए रखने वाले लोगों के बारे में दुनिया को बताएं। यदि आप भी किसी ऐसे व्यक्ति या संस्था के बारे में जानते हैं तो हमें अवश्य बताएं।

आपका अपना
अनिल कुमार

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Tuesday 26 सितंबर, 2017 02:16 AM Updated