ताज़ा खबर :
prev next

शाबाश इंडिया : जैविक खेती को बढ़ावा दे कर रोक रहे पहाड़ों से पलायन

शाबाश इंडिया : जैविक खेती को बढ़ावा दे कर रोक रहे पहाड़ों से पलायन

अल्मोड़ा। सुंदर घाटी, मनमोहक दृश्य उत्पन्न करते पहाड़, कल-कल करती नदियां। सर्दियों मे चारों तरफ बर्फ से ढकें घर और वह सब कुछ जो हम प्रकृति के समीप जाने पर पाने का एहसास करते हैं, ये पहाड़ों की हसीन वादियों में होती हैं।

लेकिन जब हम एक पर्यटक की तरह से नहीं बल्कि पहाड़ के आम आदमी की तरह से जीने की कोशिश करते हैं, तो इसका एक अलग ही रंग दिखाई देता है। हरे-भरे पहाड़ों के बीच सुनसान गाँव दिखाई देते हैं। मैदान की तरफ आने वाली राहों पर इंतजार करती बूढ़ी निगाहें दिखती हैं। बचपन से लेकर जवान तक की आँखों में मैदान की मौज मस्ती पाने की ललक दिखती है।

पहाड़ों मे एक कहावत है कि, इसका पानी और जवानी इसके काम नहीं आता है। आज के परिदृश को देखें तो पलायन अपने चरम पर पहुँच चुका है, पहाड़ों से गाँव के गाँव खाली हो रहे हैं। लेकिन उसी पहाड़ मे कुछ ऐसे लोग निकल कर आए हैं, जो न सिर्फ अपने काम से मिसाल पेश कर रहे हैं, बल्कि पहाड़ों मे होने वाले पलायन को रोकने के तरीकों पर काम कर रहे हैं।

आपको मिलवाते हैं, उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में रहने वाले पूरन सिंह बोरा से, जिन्होने जैविक खेती के माध्यम से विकास की एक नई गाथा लिख रहे हैं। साथ ही पहाड़ों की उर्वरा शक्ति को खत्म करते केमिकल्स पर निर्भरता को मात दे रहे हैं।

पूरन सिंह बोरा अल्मोड़ा के हवालबाग विकास खंड के चौना गाँव के रहने वाले हैं। आज से करीब 15 साल पहले पूरन सिंह बोरा देहरादून के एक प्राइवेट पोल्ट्री फ़ौर्म में काम करते थे। अपने गाँव से इतनी दूर नौकरी करने वाले पूरन सिंह बोरा के दिमाग मे हरदम गाँव की बंजर जमीन, पलायन करते बेरोजगार युवक, और खाली होते गांवों की तस्वीर घूमती रहती थी।

इस बीच पूरन सिंह बोरा गायत्री परिवार से जुड़े और हरिद्वार स्थित शांतिकुंज आश्रम घूमने आए। शांतिकुंज मे अध्यात्म के अलावा ग्राम्य-विकास आधारित स्वावलंबन का भी प्रशिक्षण दिया जाता है। यह देखकर इनके मन मे अपने गाँव के लिए और पहाड़ के लिए कुछ करने की ललक पैदा हुई। इसके बाद 2002 मे ये नौकरी छोड़ कर गाँव वापस आ गए।

इन्होने शांतिकुंज में देखे मॉडल को गाँव में लागू करने की पहल शुरू की। अपने बंजर खेतों को उपजाऊ बनाने के लिए पूरन सिंह बोरा ने भागीरथ प्रयास करने शुरू किए। कुछ ही समय बाद ये अपने प्लान मे सफल हुए। शुरुआती दौर मे जैविक विधि से खेती थोड़ी महंगी साबित हुई लेकिन निरंतर प्रयासों ने इन्हे विचलित नहीं होने दिया। इसके बाद इन्होने गाँव में स्वावलंबन की अलख जगानी शुरू की।

इंटर तक पढ़े हुए पूरन सिंह बोरा धीरे-धीरे जैविक खेती करने वाले सफल किसानों की कतार में आकर खड़े हो गए। करीब 13 वर्षों से जैविक विधि से सब्जियाँ उगा रहे पूरन सिंह बोरा न सिर्फ अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं, बल्कि गाँव के करीब दो दर्जन लोगों को रोजगार भी दे रखा है।

पूरन सिंह बोरा बताते हैं कि, आस पास के किसानो के बीच निःशुल्क जैविक प्रजाति के पौधों को बांटकर वे प्रोत्साहित करते हैं। जिससे कि लोग इस ओर आकर्षित हो सकें। उनके प्रयासों से करीब एक दर्जन किसान जैविक खेती अपना चुके हैं।

जैविक खाद के प्रयोग से तैयार कि गई सब्जियों को न सिर्फ अल्मोड़ा के आस पास वितरित किया जाता है बल्कि उत्तराखंड से बाहर भी भेजा जाता है। उनका कहना है कि विदेशी कंपनियों से जैविक सब्जी कि मांग आ रही है लेकिन यहाँ से पहुंचाने कि व्यवस्था न होने के कारण वे आसानी से नहीं भेज पा रहे हैं।

पूरन सिंह बोरा रासायनिक खाद कि जगह पर जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं। उनका कहना है कि रसायनिक दवाइयों के उपयोग से पहाड़ी खेतों कि उर्वरा शक्ति खत्म हो रही है। वहीं जैविक खाद गोबर, गोमूत्र, गुड़, चोकर आदि से आसानी से तैयार हो जाती है।

पूरन सिंह बोरा के इस काम से प्रभावित होकर अल्मोड़ा जिला प्रशासन ने जिले मे इस तरह का मॉडल अपना कर खेती करने वाले लोगों को तैयार करने कि योजना बनाई है। साथ ही पंतनगर कृषि विवि के वैज्ञानिकों ने भी उनके इस मॉडल कि न सिर्फ तारीफ की है बल्कि इनके खेतों में अपने प्रयोग के लिए पॉली हाउस भी बनाए हैं।

पूरन सिंह बोरा पहाड़ से पलायन करते युवकों को सन्देश देते हैं कि अपनी मिटटी छोड़कर दूसरी जगह जाना को कोई होशियारी नहीं है। कर्मठ बनो, एक नई शुरुआत करो ताकि आने वाली पीढियां पलायन के बारे में नहीं बल्कि पहाड़ों पर ही अपना रोजगार करने के बारे में सोचें।

हमारा गाज़ियाबाद के एंड्राइड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैंआप हमें फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो भी कर सकते हैं।