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बेमानी होती जन सभाएं और होर्डिंगबाज़ी

सोशल मीडिया के होते हुए भी बड़ी-बड़ी भीड़ जुटाकर भाषण देने का आज क्या औचित्य है? शहर में जगह-जगह लगे पोस्टर्स और होर्डिंग्स कौन पढ़ता है? आज 21वीं सदी में भी हमारे नेतागण जनसंवाद के लिए रैलियों और होर्डिंग्स को क्यों जरूरी समझते हैं? क्या जनता मूर्ख है या फिर नेता ऐसा सोचते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं की नेता ही मूर्ख हैं? और ये भी हो सकता है कि हम नासमझ लोग इन ज्ञानी नेताओं को ही न समझ पा रहे हों। आज का यक्ष प्रश्न यह है कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया मिलकर भी रैलियों और शहरों को बदरंग बनाते होर्डिंग्स के चलन को समाप्त क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

“हमारा गाज़ियाबाद” न्यूज़ पोर्टल आज, फेसबुक पेज के द्वारा प्रति सप्ताह 3 लाख से अधिक लोगों तक पहुँचता है। वेबसाइट, मोबाईल एप्लीकेशन, व्हाट्स एप, ट्विटर और इन्स्टाग्राम पर “हमारा गाज़ियाबाद” को पढ़ने वालों की संख्या भी पचासियों हज़ार है। एक अदना सा न्यूज़ पोर्टल, बेहद छोटे से बजट में, बिना शहर की सूरत बिगाड़े और सड़कों पर जनता को हलकान किए बिना इतने लोगों के बीच पहुँच सकता है, तो हमारे काबिल नेता क्यों रैलियां करते फिरते हैं? हो सकता है कि ये नेता सिर्फ एकतरफा संवाद चाहते हैं यानी ये बोलेंगे और जनता सुनेगी? रैलियों में एक फायदा और भी है कि यहाँ आई जनता इनके अपने द्वारा लाई गई होती है, इसलिए सवाल पूछने वाला वहां कोई होता ही नहीं है। रैली अगर सत्तारूढ़ दल के नेता की हो, तो पुलिस और प्रशासन किसी विरोधी को रैली स्थल तक पहुँचने ही नहीं देता।

तो ठीक है, अब समझ में आया कि रैलियों से हमारे नेता अपनी शक्ति दिखाकर विपक्षी नेताओं को डराने का काम करते हैं। रैली की भीड़ को तीन-चार गुना बढ़ा कर बताने में भी सुविधा रहती है। स्थानीय नेता भी अलग-अलग झुंड में भीड़ जुटाकर अपनी-अपनी हैसियत दिखा लेते हैं। स्थानीय स्तर के पार्टी नेता अपना प्रबंध कौशल भी इन्हीं सभाओं में दिखा सकते हैं। विरोधी पक्ष भी काले झंडे दिखाकर अपना विरोध प्रदर्शन कर लेता है। यानी सारी कसरत नेताओं के अपने लिए ही होती है। जनता तो कौतुक देखकर ही दंग होती रहती है। समझदार लोग नेताओं की इस फालतू कसरत को देखकर हंस लेते हैं, तो आम समझ का आदमी भीड़ और मेले की रौनक पर ही चर्चा कर के खुश रहता है।

तो लबो-लुबाब यह है कि नेताओं के लिए ही रैलियाँ होती हैं। नेताओं के अपने फायदे के लिए पोस्टर, बैनर और होर्डिंग्स लगते हैं और नेताओं के लिए ही जनता को परेशान हैरान किया जाता है। पाने वाले नेता होते हैं और खोने वाली जनता। पर जनता शायद अब ज्यादा दिन इस मूर्खता को बर्दाश्त नहीं करेगी । जनता जागेगी और कहेगी कि हमें परेशान न करें और हमारे शहर की शक्लो-सूरत न बिगाड़ें। यदि आप हमसे कुछ कहना चाहते हैं तो हमारी भी सुननी होगी। इसलिए सोशल मीडिया पर ही संवाद करो। जब ऐसा होगा तो मजबूर होकर नेता रैलियों, तमाशों और कौतुकों से हाथ खींच लेंगे और सोशल मीडिया पर जनता से संवाद स्थापित करेंगे।

ऐसा जल्द ही हो इसी उम्मीद के साथ
आपका अपना,
अनिल गुप्ता

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Saturday 18 नवंबर, 2017 17:17 PM