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शाबाश गाज़ियाबाद: पिता ने सहयोग देना बंद किया तो खेतों में हल चलाकर किया अपने सपनों को पूरा

शाबाश गाज़ियाबाद: पिता ने सहयोग देना बंद किया तो खेतों में हल चलाकर किया अपने सपनों को पूरा

गाज़ियाबाद। जब इन्सान संघर्षों को अपनी ताक़त मानता हो और भविष्य में आने वाली अड़चनो से निडर होकर बस अपने लक्ष्य को पाने के लिए आतुर हो तो उसका साथ किस्मत और वक्त दोनों देने लगता है। आमतौर पर देखा जाता है कि लोगों को पता ही नही होता कि उनका लक्ष्य क्या है। ऐसे लोग भटकते हैं, गिरते हैं, परेशान होते हैं और फिर उसके बाद ऐसे रास्ते या कार्य चुनते हैं जिसे करने में उनका मन नही लगता। या फिर यूँ कहें कि उनके लक्ष्य पाने के रास्ते बहुत पीछे छूट जाते हैं।

हमारा गाज़ियाबाद की टीम आज आपको एक ऐसे ही उभरते व्यक्ति की कहानी बताने जा रही है जिन्होंने अपने लक्ष्य को पाने लिए अपनी जरूरतों की कुर्बानी दे दी और वर्तमान में ऐसे मुकाम पर हैं जिसे पाने की इनकी इच्छा बचपन से थी। ये कहानी है राजीव कुमार पांडे की जो वर्तमान में शाहपुर बम्हेटा के किसान आदर्श हायर सेकण्ड्री स्कूल के प्रधानाचार्य हैं। प्रधानाचार्य पद के इस मुकाम पर पहुँचने तक राजीव पांडे का सफर संघर्षों और चुनौतियों से भरा है।

राजीव पांडे बताते हैं कि अपने बेटे को पढ़ाने और उसका सपना पूरा करने के लिए हर पिता दुनिया से लड़ने को तैयार रहता है लेकिन इनके पिता राजीव के सपने के खिलाफ थे। जिस उम्र में एक बेटे को अपने पिता की सबसे ज्यादा जरूरत होती है उस वक्त राजीव के पिता ने इनका सपोर्ट करना बंद कर दिया। राजीव आगे बताते हैं कि ये पढ़ाई में शुरू से ही काबिल थे, हर विषय में अव्वल आना इनकी कला थी। बचपन में इनका परिवार काफी गरीब था। जब नौवीं कक्षा में थे तो अपनी फटी पैंट को शर्ट से ढक लिया करते थे ताकि कोई मजाक न बनाये।

इन्होने अपने बलबूते ही अपनी पढ़ाई पूरी की और अपनी बहनों की शादी भी की। अपनी संघर्ष भरी कहानी का कुछ अंश जाहिर करते हुए राजीव पांडे कहते हैं कि जब पिता ने सपोर्ट बंद कर दिया तो अपने खेतों में हल जोतकर, मजदूरी करके अपनी पढ़ाई की फीस भरने लगे। पढ़ाई के बीच में ही इनकी शादी कर दी गई। शादी के बाद इनकी मुश्किलें और बढ़ने लगीं। लेकिन राजीव पांडे ने हिम्मत नही हारी। 12वीं पास करने के बाद इन्होने आगे की पढ़ाई करने के लिए बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू कर दिया।

शुरू से ही इनकी रूचि हिंदी विषय में थी, इसलिए परास्नातक की डिग्री भी हिंदी में ही ली। धीरे-धीरे इनका लिखने का शौक बढ़ने लगा और पढ़ाई के दौरान ही एक उपन्यास लिखने का मन बनाने लगे और इसपर काम भी करना शुरु कर दिया। आखिरकार इनकी मेहनत सफल हुई और इनका उपन्यास “आखिरी मुस्कान” प्रकाशित हो गया। राजीव बताते हैं कि इनके उपन्यास में ही इन्ही की जिन्दगी के कुछ अंश भी लिखे हैं। खास बात ये कि इन्होने अपना उपन्यास केवल 22 दिनों में लिखा है।

राजीव यहीं तक नही रुके, इसके बाद इन्होंने अपने ही बलबूते पीएचडी की उपाधि ली और आज प्रधानाचार्य के अच्छे पद पर तैनात हैं। राजीव पांडे शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में भी पारंगत हैं। कविता लिखना इनका शौक है, लेखनी इनके जीवन का अहम हिस्सा है और इन सबके साथ ये पत्रकार भी हैं। इसके अलावा सामाजिक कार्यों में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान है। इन्हें कई अवार्ड और सम्मान भी मिल चुके हैं। इतने संघर्षों और जिन्दगी के उतार चढ़ाव के बाद इस मुकाम पर पहुंचकर राजीव पांडे सुकून की जिन्दगी जी रहे हैं और अपने स्कूल के बच्चों को भी उच्च शिक्षा देकर उनके भविष्य को बेहतर बना रहे हैं।

हमारा गाज़ियाबाद की टीम राजीव पांडे के इस संघर्ष और जज्बे को सलाम करती है।

 

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