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शाबाश गाज़ियाबाद : बच्चों ने साथ छोड़ा लेकिन नही टूटी हिम्मत, अपनी मेहनत के बलबूते जी रही ज़िन्दगी

शाबाश गाज़ियाबाद : बच्चों ने साथ छोड़ा लेकिन नही टूटी हिम्मत, अपनी मेहनत के बलबूते जी रही ज़िन्दगी

गाज़ियाबाद। हर आदमी अपने बच्चों को इस लिए पालता-पोसता है कि बुढ़ापे में उसके बच्चे उसका साथ देंगे। उसको वें सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध कराएँगे जिसकी उसे बुढ़ापे में जरूरत होगी। लेकिन उसके सपनों पर सबसे बड़ा कुठाराघात तब होता है, जबकि यही बच्चे जिसको उसने बड़े ही चाव से पाल-पोस कर बड़ा किया है उसका साथ छोड़ देते हैं।

कुछ इन कठिन परिस्थितियों के आगे घुटने मोड़ देते हैं तो वहीँ कुछ ऐसे भी होते हैं जो कि अपने-आप पर विश्वास करते हैं। साथ ही सुकून के साथ अपनी मेहनत की कमाई खाकर अपनी ज़िन्दगी जीते हैं।

आज मिलाते हैं आपको सरोज देवी से जो इस बात को साबित करती हैं कि, परिवार भले साथ छोड़ दे लेकिन आपने आप का साथ न छोड़ो। अगर आपने खुद का साथ छोड़ दिया तो दुनिया में आप कुछ नहीं कर सकते सिवाय आंसू बहाने के।

सरोज देवी की उम्र करीब 60 साल है। मात्र 12 वर्ष की उम्र में सरोज देवी की शादी कर दी गई। लेकिन शादी के करीब 10 साल बाद इनके पति की मौत हो गई। सरोज देवी ने पति की मौत के बाद से ही अपना और बच्चों का पेट पालने के लिए घरों में काम करना शुरू कर दिया। वे शहर के विभिन्न घरों में जाती थी और घरेलू काम कर के अपना और अपने बच्चों का खर्च चलाती थी। इस तरह से इन्होने अपने चार बच्चों को पाल-पोस कर बड़ा किया।

इसे किस्मत कहें या फिर कुछ और कि जिन सपनों के साथ उन्होने अपने बच्चों को बड़ा किया वही धोखा दे गए। अब हालात यह है कि शादी हो जाने के बाद लड़कियां तो अपने ससुराल चली गई। लेकिन लड़कों ने सरोज को खर्चा-पानी देना बंद कर दिया।

लेकिन सरोज ने हिम्मत नहीं हारी और वें घरों में काम के अपना गुजारा करती रही। पिछले 5 साल से वे राजनगर में अनिल कुमार गुप्ता के घर में काम कर रही है। इसके अलावा अन्य घरों में भी वे घरेलू काम करती हैं।

सरोज देवी पूरी उम्मीद के साथ कहती हैं कि, मेरा भरोसा अपनी मेहनत पर है। लड़कों ने साथ छोड़ दिया तो क्या हम जीना छोड़ देंगे। मेरा जो कर्तव्य था उन लोगों का पालन-पोषण करना वो मैंने किया। अब अपने कर्तव्य से वे भाग गए तो इसमें किस बात का अफ़सोस। अपनी जिन्दगी अपनी मेहनत से गुजार रही हूँ।

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