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कब बदलेंगे आज़ादी के मायने

भारत को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुए 71 साल हो गए। पूरे देश में धूमधाम से स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। बदलते वक्त में लोगों के लिए मजबूत वैचारिक मंच के रूप में मौजूद सोशल मीडिया पर तो क्रांति मच गई। हर कोई यहाँ आजादी के रंग में डूबा दिखा। बच्चों से लेकर बढ़े बूढ़े, अमीर-गरीब सब ने अपने-अपने तरीके से आजादी सालगिरह पर अपनी ख़ुशी जाहिर की।

लेकिन जरा सोचिए, आजादी की लड़ाई के मूल उद्देश्यों को पूरा कर पाने में हम कामयाब हो पाए। क्या हमें समाज में छाए सम्प्रदायवाद से आजादी मिल पायी। हम धर्म के बेतुके कार्यों से अपने आपको आजाद कर पाये, जिसमें खुले-आम कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं और लोगों को एक दूसरे के खिलाफ भड़काया जाता है।

आज हम धर्म के गुलाम बन रहे हैं, इंसानियत धर्म के आतंक से भयभीत है। क्या हमें बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, उपभोक्तावाद, बाजारवाद, विभिन्न राज्यों के बीच पलायन, जातिवाद, मजबूर किसानों की आत्महत्या, बाल श्रम और महिला उत्पीड़न से आजादी मिली? नहीं, बल्कि प्रगति के नाम पर हमारे ऊपर पश्चिम का बाजारवाद थोपा गया। विकास के लिए हमने दूसरे देशों की नकल करनी शुरू की। जबकि हम भूल गए कि दूसरे देशों की विकास पद्धतियाँ उनकी अपनी प्रकृति के अनुरूप हैं। हमें अपनी प्रकृति के अनुरूप अपना विकास मॉडल तैयार करना चाहिए। जीवन जीने के लिए जरूरी चीजों को नकार कर हम विकास और उपभोक्तावाद की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं।

शिक्षा के क्षेत्र में हमने मैकाले मॉडल की नकल की जबकि हमें चाहिए था कि, हम बच्चे अथवा बड़ों के शरीर और मन की श्रेष्ठ क्षमताओं का सर्वांगीण विकास करें। आज हम बच्चों को शिक्षा देने के बजाय केवल ज्ञान दे रहे हैं। बच्चों पर नम्बर लाने का प्रेशर है जबकि हमारा उद्देश्य ऐसी शिक्षा देना होना चाहिए था, जिस में बच्चा शिक्षण के आरंभ के साथ ही अपने आप को उत्पादन के योग्य बनाता जाए। जिससे वह नौकरी पर आश्रित होने के बजाए स्वरोजगार पर केन्द्रित हो पाता।

हमें पता होना चाहिए कि, भारत के करीब 17.8 मिलियन लोगों को रोजगार मुहैया कराना आसान काम नहीं है। लेकिन अगर ग्राम आधारित स्वावलंबन के मॉडल को अपना ले तो यह ज्यादा मुश्किल भी नहीं है। जिसमें बताया गया है कि देश का हर एक गाँव अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए अपने पाँव पर खड़ा हो। अपने दैनिक जीवन को चलाने के लिए और आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उसे शहर का मुंह न देखना पड़े।

1947 के बाद विकसित हुए औद्योगिक ढांचे ने उत्पादन के केन्द्रों को शहरी क्षेत्रों में स्थापित कर विकास के चंद टापुओं का निर्माण किया है। कृषि आधारित उद्योगों की अनदेखी के चलते विकास का जो मॉडल खड़ा हुआ है वह शहरी क्षेत्र के पढ़े लिखे वर्ग के लिए ही अनुकूल साबित हुआ। झूठे जनतंत्र की दुहार्इ देते विश्व बाजार का सच आज की वास्तविकता है। जो कि घरेलू उद्योगों और उनके विकास में शामिल बाजार को भी अपनी चपेट में लेता जा रहा है।

आज देश के तमाम क्षेत्रों में किसान और ज़मीन के सवाल खड़े हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के नाम पर वैश्विक पूंजी की पैरोकारी ने जो अफरा-तफरी मचायी है, उसने जनतंत्र को लूट तंत्र में बदल दिया है। सहकारिता का मॉडल अपना कर हम देश में होने वाली मजबूर किसानों की लाखों हत्याओं को रोक सकते हैं। वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग कर हम गाँव आधारित उत्पाद को बढ़ावा दें ताकि किसानों को आर्थिक लाभ हो और वे कृषि कार्य से भागने के बजाय उसको अपनाने पर जोर दें।

देशी बाजार की मनमानी भी कोर्इ छुपी हुर्इ बात नहीं। खेतों से व्यापारियों के हाथों में जाने वाली मक्के, गेहूं, चावल, टमाटर, आलू को कम रेट में खरीद लिया जाता है। नामी कम्पनियां उनसे जो उत्पाद बनाती हैं तो उसके दाम बीसियों गुना बढ़े होते हैं।

हमें अंग्रेजों की गुलामी से आजादी तो हमें मिल गई लेकिन इसके असल मायनों से आज भी हम कोसों दूर हैं। आखिर इस तरह की आजादी पाकर हम क्यूँ वजूद, इतिहास, संस्कृति को भूल कर प्रकृति से दूर जा रहे हैं। जबकि हमें चाहिए कि विकास का एक अपना मॉडल विकसित करें जिस में हमारी प्रकृति के अनुरूप सारी व्यवस्थाएं संचालित हों ग्राम स्वराज्य, ग्राम आरोग्य, स्वावलंबन, सहभागिता, आर्थिक समानता स्थापित कर विश्व के सामने एक अनूठी आजादी की मिसाल पेश करें।

आपका अपना
अनिल कुमार

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Saturday 18 नवंबर, 2017 17:16 PM