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शाबाश गाज़ियाबाद: बीमारी भी नही डिगा पाई जीने का हौंसला, महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रही हैं निशा देवी

शाबाश गाज़ियाबाद: बीमारी भी नही डिगा पाई जीने का हौंसला, महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा दे रही हैं निशा देवी

गाज़ियाबाद। सुख और दुख एक ही जीवन के दो पहलू हैं। इन्सान की जिन्दगी में एक समय ऐसा भी आता है जब वो बहुत खुश होता है लेकिन वक्त बदलने के साथ कुछ समय के लिए वो दिन भी आता है जब उसकी जिन्दगी दुखों से गुजर रही होती है। दुःख की इन परिस्थितियों में इन्सान पूरी तरह टूट चुका होता है। लेकिन ये भी सच है कि अगर हम इन परिस्तिथियों में भी खुद को सम्हाल ले गए तो जीवन जीने के और भी नए तरीके मिल सकते हैं।

आज हमारा गाज़ियाबाद की टीम आपको ऐसी महिला की कहानी बताने जा रही है जो दुःख के सागर में डूबकर भी हताश नही हुई। दुःख के ऐसे समय में न तो इनकी हिम्मत टूटी और न ही इन्होंने किसी से मदद मांगी। आज भले ही ये दूसरों घरों में काम करती हैं, सड़क किनारे भुट्टे बेचती हैं लेकिन अपने काम को ही अपना सबकुछ समझती हैं।

मूलरूप से उत्तम विहार दिल्ली की रहने वाली निशा देवी वर्तमान में लालकुआं इलाके में किराये पर रहती हैं। इनकी कहानी खुद की जिन्दगी के लिए मिसाल है। 24 साल पहले उत्तम विहार में इनका नाम बोलता था। इनका अपना खुद का घर था और एक सम्पन्न परिवार था। इनकी एक बेटी भी है जिसकी शादी कर चुकी हैं। निशा देवी अपनी शादी के समय से ठेकेदारी का काम कर रही थीं। इनके इस काम में पति प्रेमपाल ने भी इनका पूरा साथ दिया। इनके पति प्रेमपाल को समाज के उलाहनों की फ़िक्र नही थी। समाज में निम्न स्तर की सोंच रखने वालों ने इनकी पत्नी के काम करने पर ऐतराज जताया लेकिन इसका भी प्रेमपाल पर कोई असर नही हुआ।

निशा देवी कहती हैं कि इनकी जिन्दगी में सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन एक बार ऐसी घटना घटी कि सबकुछ एक झटके में बदल गया। उत्तम विहार स्थित अपने घर के तीसरे फ्लोर से ये गिर गईं। इस हादसे में इनके हाँथ और पैर की हड्डियाँ टूट गईं। प्रेमपाल के पास इतने पैसे नही थे कि ये अपनी पत्नी निशा का इलाज़ करा सकें। निशा ने इतने दिन तक जो भी कमाया था वो सब अपने इलाज में लगा चुकी थीं। इस हादसे के बाद इनका परिवार अर्श से फर्श पर आ चुका था। हालात इतने बदतर हो गए की निशा को अपनी बीमारी के इलाज़ के लिए अपना घर बेचना पड़ गया।

निशा देवी कहती हैं कि यदि इनकी जगह कोई और होता तो शायद अपना जीवन खत्म ही कर लेता। निशा आगे बताती हैं कि ये अपनी बेटी से बहुत प्यार करती हैं और ऐसा कोई भी गलत कदम उठाकर अपनी बेटी और समाज की नजरों में गिरना नही चाहती। इन शब्दों को कहने के बाद निशा के चेहरे पर खुद्दारी और आत्मविश्वास की चमक थी। अपना घर बेचने और अपनी बीमारी ठीक होने के बाद निशा और प्रेमपाल के सामने अपनी बेटी और खुद के भविष्य की चिंता थी। आखिरकार इन सारे उतार-चढ़ाव के बाद निशा ने कुछ घरेलू काम करने शुरू कर दिए। लोगों के घर जाकर खाना बनाने लगीं। इसके अलावा और भी जो काम मिलता रहा वो भी करती रहीं।

इन्ही सब कामों को करने से चंद पैसो से इनकी घर की रोजी-रोटी चलने लगी। हांलाकि अब निशा और उनके पति का वक्त पहले जैसा नही था लेकिन अपनी जरूरतों और परिस्तिथियों के हिसाब से दोनों ने खुद को ढाल रखा हैं और खुश हैं। इतनी सारी मुसीबतें आने के बाद भी निशा की हिम्मत नही टूटी इसलिए इनकी जिन्दगी दूसरों के लिए मिसाल है।

आजकल निशा एबीईएस कॉलेज के सामने भुट्टे बेचकर अपनी जीवन नैया चला रही हैं। इसके अलावा कोई और भी काम मिलता है तो कर लेती हैं। बेटी की शादी कर चुकी हैं इसलिए चिंतामुक्त हैं। निशा देवी कहती हैं इन्ही सब छोटे-छोटे काम करके अपनी जिन्दगी खुद्दारी और ईमानदारी के साथ गुजार देंगी।

निशा देवी की जिन्दगी उन महिलाओं के लिए प्रेरणा है जो समाज के डर से अपने घरों से निकलने में कतराती हैं। महिला सशक्तिकरण का सन्देश दे रही इनकी जिन्दगी उन पुरुषों के लिए भी प्रेरणा है जो अपनी छोटी सोच के जरिये अपनी पत्नियों को घरों में कैद कर देना चाहते हैं। निशा देवी के साहस भरे इस जीवन को हमारा गाज़ियाबाद की टीम सलाम करती है और आपसे भी अनुरोध करती है कि यदि आपके आसपास भी ऐसे लोग रहते हों तो उनकी कहानी हमें hamaraghazibad100@gmail.com पर भेज दें। 

 

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