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शाबाश इंडिया : बिरयानी बनाने के हुनर ने दी गरीबी से लड़ने की ताकत

शाबाश इंडिया : बिरयानी बनाने के हुनर ने दी गरीबी से लड़ने की ताकत

गाज़ियाबाद। गरीबी की धूप वो धूप होती है जिसमें कई गरीबों का पेट जलता रहता है। गरीबी के धूप को सहने की क्षमता हर किसी में नहीं होती। कोई इस धूप को बर्दाश्त करने में सफल हो जाता है तो कोई इसी तपती धूप में तड़पकर मर जाता है। ये भी सच है जिसने अपने जीवन में इस दुर्लभ समय को पार कर लिया वह हीरे सा चमक उठता है।

हमारा गाज़ियाबाद की टीम आज आपको एक ऐसे शख्स की कहानी बताने जा रही है जिसने गरीबी के सामने अपने घुटने नहीं टेके बल्कि मेहनत करके अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं और बच्चों को पढ़ा रहे हैं |

संजयनगर जिला अस्पताल वाले रास्ते में 10 रूपये प्लेट बिरयानी बेचने वाले राजू ने गरीबी से हार ना मानने की ज़िद ठान ली है और अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर शिक्षित करने का फैसला लिया है | केवल बिरयानी बेचकर इनके घर का खर्च नहीं निकल पाता जिसके कारण इनकी पत्नी को भी काम करना पड़ा।

10 रूपये प्लेट वेज बिरयानी बेचने वाले राजू अपने परिवार के साथ संजयनगर में किराए के एक मकान में रहते हैं।  इनकी शादी 18 साल पहले हुई थी। इनके तीन बच्चे है और तीनों स्कूल में पढ़ते हैं। इनकी पत्नी आस-पास के घरो में बर्तन साफ करने व झाड़ू लगाने का काम करती है।

पढ़ा-लिखा न होने के कारण इन्हें कई दिनों तक दर-दर की ठोकरें खानी पड़ी| लोगों ने इन्हें काम देने से मना कर दिया । गरीबी में काम न मिलने और बच्चों को पढाने लिखाने कि चिंता इन्हे खाए जा रही थी। इसके बावजूद भी इन्होंने हार नहीं मानी | शादी के बाद कुछ साल तक इन्होने छोटे-मोटे काम कर किसी तरह परिवार का गुजारा किया। इस दौरान जिस दिन इन्हें काम मिल जाता था उस दिन का खर्च भी निकल जाता था पर किसी दिन काम न मिलने के कारण इन्हें भूखे भी सोना पड़ जाता था |

मज़बूरी और गरीबी की आंधी में जूझते-जूझते ये थक चुके थे तब जाकर इन्होंने खुद का काम शुरू करने का फैसला लिया | बचपन से ही माँ के साथ कामों में और खाना बनाने के कारण इन्हें अच्छी तरह से खाना बनाना आ गया था, पर ज्यादा पैसे न होने के कारण इन्होंने कम लागत में कुछ काम करने का फैसला लिया | चूँकि कम लागत में बिरयानी बेचीं जा सकती थी इसलिए इन्होंने बिरयानी बेचने का ही निर्णय लिया |

पिछले कुछ सालों से इन्होंने बिरयानी बेचने का काम शुरू किया है। और इसी तरह बिरयानी बेचकर अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इनकी चलती-फिरती दुकान सुबह 7 बजे से अपने ग्राहकों के आने की राह देखने लगती है, और दोपहर के दो बजे तक समाप्त हो जाती है। इसके बाद वे अपने छोटी सी दुनिया  में  चहकने वाले छोटे, मासूम बच्चों के सपनों को उड़न देने में लग जाते हैं |

गरीबी की आंधियों से जूझते इनके परिवार ने किसी के सामने हांथ नहीं फैलाया और काम करके खुद्दार की जिन्दगी जीने का फैसला किया है। वर्तमान समय में शिक्षा के महत्व को देखते हुए इन्होंने अपने सभी बच्चों को पढ़ाने का फैसला किया।

हमारा गाज़ियाबाद की टीम राजू बिरियानी वाले के इस जज्बे को सलाम करती है |

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By प्रगति शर्मा : Monday 20 नवंबर, 2017 09:13 AM