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पडे़गी छाया तुमपे कभी न पाप की, ले लो दुआएं तुम अपने मां-बाप की

पडे़गी छाया तुमपे कभी न पाप की, ले लो दुआएं तुम अपने मां-बाप की

जिसने अपने कोख में, पालन-पोषण हमारा किया,
सह के कई पीड़ाओं को, जिसने था हमें जन्म दिया,
उनके सारे अहसानों का, क्या हम कभी कर्ज चुका पाएंगे?
क्या उनको दुःख देकर हम कभी खुश रह पाएंगे?

प्रश्न नहीं है यह सरल, हमारे अस्तित्व पर एक प्रश्न चिन्ह है,
मां- बाप की दुर्दशा देख, ईश्वर भी हमसे ख्न्नि है,
जिनके उंगलियों को पकड़ हमने चलना सीखा,
जिनके कंधों पर बैठ सारा जहान देखा,
उनके निश्छल प्रेम को कई जन्म भूला नहीं पाएंगे,
क्या उनको दुःख देकर हम कभी खुश रह पाएंगे?

मां के आंचल की छाया में पल, बच्चे बड़े हो जाते हैं,
स्वयं को सबसे श्रेष्ठ समझ, मन ही मन इतराते हैं,
कर बैठते हैं भूल, झूठे आकर्षण में पड़कर
खो देते हैं प्रेम सच्चा वे, मां-बाप को तजकर,
क्या उनको घर से निकाल हम, चैन की नींद सो पाएंगे?
क्या उनको दुःख देकर हम कभी खुश रह पाएंगे?

गर जो इसी तरह बिलखता, रोता रहा दिल मां-बाप का,
हमारे कुकर्मो से फिर, भर जाएगा घड़ा ये पाप का,
फिर न कभी कोई मां-बाप बच्चों को जन्म देना चाहेगा,
ऐसे में क्या हमारा अस्तित्व ज्यादा दिन तक टिक पाएगा ?
क्या उनको आंसु देकर हम मुस्कुरा भी पाएंगे?
क्या उनको दुःख देकर हम कभी खुश रह पाएंगे?

क्यों न हम भी अपनी भूल को, एक भूल समझकर भूल जाएं,
छोड़ के सारे झूठे आकर्षण, माता-पिता के चरणों में आएं,
काम करे कुछ ऐसा के हम पर, गर्व हो हमारे दाता को,
छोड़े सारा जहान पर न पर, न छोड़े कभी मां-बाप को,
क्योंकि उनके बलिदानों का हम ऋण चूका न पाएंगे,
लेकिन उनकी खुशियों की खातिर हम, दुनिया से बैर कर जाएंगे।

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By प्रगति शर्मा : Monday 26 फ़रवरी, 2018 04:43 AM