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हँसता शहरी,कराहता किसान

पिछले कुछ दिनों से टमाटर बहुत चर्चा में है। सोशल मीडिया से लेकर किट्टी पार्टी तक हर जगह टमाटरों के बढ़ते दामों की ही बातें हो रहीं हैं। इन दिनों व्हाट्स एप पर शेयर होने वाला हर तीसरा सन्देश टमाटर पर आधारित कोई चुटकुला होता है। आखिर हो भी क्यों न आखिर खाने का अभिन्न अंग होने के कारण बिना टमाटर के रहा भी नहीं जा सकता है।

लेकिन हम में से ज्यादातर लोगों ने बिना दाम बढ़ने का कारण जाने, टमाटर वाले चुटकुले आगे बढ़ा कर इतिश्री कर ली और अनजाने में मास हिस्टीरिया का शिकार हो गए। फ्रेंच भाषा में इस स्थिति को Folie à deux कहा जाता है। हालाँकि इसका ठीक-ठीक हिंदी रूपांतरण करना मेरे लिए असंभव सा है मगर साधारण शब्दों में कहूँ तो इसका मतलब होता है बिना सच जाने ही एक बात को दूसरे व्यक्ति तक पहुँचाना। जब यही बात कई व्यक्तियों द्वारा दुहराई जाये तो इसे folie à plusieurs कहते हैं, जिसका मतलब होता है भीड़ का पागलपन। फ्रांसीसियों का तो पता नहीं मगर हम हिन्दुस्तानियों में यह पागलपन कुछ ज्यादा ही है।

अब हम folie à plusieurs को छोड़कर टमाटर पर आते हैं। क्या आप को मालूम है कि आम भारतीय भोजन में आलू और प्याज़ के बाद टमाटर हमारी तीसरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। जबकि दुनिया भर के लोगों के भोजन का आलू के बाद टमाटर दूसरा अभिन्न अंग है। एक बात और, हमारे देश में सबसे ज्यादा टमाटर अविभाज्य आंध्र प्रदेश में उगाया जाता था। इसके बाद कर्नाटक और अन्य दक्षिणी राज्यों का नंबर आता है। वर्ष 2014-15 के दौरान आंध्र प्रदेश में 3354.46 हजार टन टमाटर उगाया गया। वर्ष 2015-16 के दौरान पूरे भारत में लगभग 187 लाख टन टमाटर की पैदावार हुई जो कि 2014-15 के मुकाबले 15 प्रतिशत अधिक था। इस साल लगभग 189 लाख टन टमाटर पैदा होने की संभावनाएं है।

आपको शायद पता न हो कि टमाटरों के दाम बढ़ने का कारण उनकी कम पैदावार नहीं है। हम सब जानते हैं कि टमाटर एक पेरिशेबल आईटम है और बरसात के महीनों में हर साल जून-सितम्बर के दौरान इसके दाम बढ़ जाते हैं। इस साल देश की सबसे बड़ी मंडी नासिक में भी बहुत अधिक बारिश हुई, जिसके कारण टमाटर की आवक कम रही। और जो भी टमाटर आया उसमें से ज्यादातर बारिश के कारण ख़राब हो गया। इन सब के बावजूद भी जुलाई की शुरुआत तक देश की बड़ी मंडियों में टमाटर का भाव 35 से 50 रुपयों के बीच ही रहा। जो कि पिछले साल के मुकाबले लगभग बराबर ही था।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब महानगरों में रहने वाले तथाकथित एलीट, पढ़े लिखे और folie à plusieurs का शिकार तबके ने साग-सब्जियों के बढ़ते दामों का मजाक उड़ाया हो। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि गाँव और खेत खलिहान से जुड़े लोगों को ऐसे मजाक देखकर कितना दुःख होता है? टमाटर पर अगला जोक फॉरवर्ड करने से पहले जरा उस किसान के बारे में सोचिए जिसकी तैयार खड़ी फसल खेतों में पानी भरने के कारण बरबाद हो गई। उस बेचारे की तो सारी जमा पूँजी उस फसल की देखभाल में ही खर्च हो गई थी। खेत से मुहल्ले के सब्जीवाले तक फसल को पहुँचने में कई पड़ावों से गुजरना पड़ता है। क्या आपने कभी सोचा है कि पहले गाँव की मंडी, उसके बाद बड़ी मंडी और फिर ट्रकों में लदकर दूसरे शहर की मंडी से गली के सब्जी वाले तक पहुँचने के दौरान हर पड़ाव पर सब ने कमाया – बस एक किसान ने ही गंवाया।

हम महानगरों में रहने वालों को प्रकृति और उस पर आधारित रोजगारों से जुड़े अपने लोगों का भी ध्यान रखना होगा। अंत में बस इतना ही कहकर अपनी लेखनी को विश्राम दूंगा कि केवल हंसी-ठट्ठे के लिए किसानों को बदनाम करने से बचें और उनकी वेदनाओं को भी समझें।

आपका अपना
अनिल कुमार