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कांवड़ के बाद

सावन के पहले दिन से शुरू हुआ कांवड़ यात्रा का पर्व शिवरात्रि को समाप्त हो गया। अगर छिटपुट घटनाओं को छोड़ दिया जाये तो लगभग 20 दिन तक चलने वाला यह समारोह शांतिपूर्वक ही रहा। इस दौरान करोड़ों शिव भक्तों का काफिला गंगोत्री से शुरू होकर उत्तरकाशी, ऋषिकेश, हरिद्वार, रुड़की, मंगलौर, छपार, मुज़फ्फरनगर, मेरठ और गाज़ियाबाद से होते हुए दिल्ली की ओर निकला। इस बार कांवड़ यात्रा की खासियत रहा, भक्ति और देशभक्ति का सुन्दर मिलन। भोले अपनी सजी-धजी कांवरों पर शान से तिरंगा लहराए घूम रहे थे। इस बार भोलियों (महिला कांवरियों) की संख्या भी अच्छी खासी ही थी।

कांवड़ का सटीक इतिहास तो मिलना मुश्किल है मगर कुछ लोगों का कहना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ यात्रा कर भगवान शिव पर जल चढ़ाया था और उसके बाद यह सिलसिला चल पड़ा। कुछ विद्वानों का मानना है कि समुंदर मंथन से निकले विष को पीने के कारण भगवान शिवजी का गला नीला हो गया था। विष के कारण उनके शरीर पर कई नकारात्मक प्रभाव पड़ गए थे। इन नकारात्मक प्रभावों से मुक्ति दिलाने के लिए उनके भक्त रावण ने काफी पूजा-पाठ की और कांवड़ में जल भरकर शिवमंदिर में चढ़ाया। जिसकी वजह से शिव जी सभी नकारात्मक प्रभावों से मुक्त हो गए।

खैर, शुरुआत की वजह कोई भी रही हो मगर आज कांवड़ में गंगाजल लाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाने की यह पूजा पद्धति करोड़ों लोग अपना रहे हैं। कुछ लोग अपने-अपने निजी कारणों से मन्नत मांगते हैं और जब वह मन्नत पूरी हो जाती है तो वे कांवड़ लाते हैं। बहुत से लोगों के लिए यह तीर्थ यात्रा का एक स्वरुप है। बहुत से नौजवान इसे वार्षिक पर्यटन के रूप में भी लेते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान तीर्थ यात्रियों की सेवा करने के लिए जगह-जगह शिविर भी लगते हैं। इन शिविरों के जरिए जहाँ लाखों लोग सेवा का पुण्य कमाते हैं वहीं बहुत से राजनैतिक दल भी अपने शिविर लगाकर लोगों को अपने चेहरे याद दिलाते रहते हैं। मार्ग में बहुत से मुस्लिम भाई भी कांवड़ शिविर लगाकर हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रचार करते हैं जो सराहनीय है। इस कांवड़ के बहाने बहुत से लोगों के व्यापार में भी अच्छी खासी वृद्धि होती है। बल्कि अगर यूँ कहा जाये कि कांवड़ यात्रा अपने आप में रोजगार का एक साधन बन गई है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। टी-शर्ट बनाने और बेचने वाले, डीजे, टेंट हाउस, हलवाई, सजावटी लाइटें लगाने वाले आदि ऐसे बहुत से पेशे हैं जिनकी इन 15-20 दिनों में अच्छी खासी आमदनी हो जाती है।

कांवड़ यात्रा को सफल बनाने के लिए कांवड़ के रास्ते में पड़ने वाले सभी शहरों की पुलिस-प्रशासन की टीम, कांवड़ शिविर लगाने वाले लाखों सेवादार, सिविल डिफेंस के सदस्य और वे सभी लोग बधाई के पात्र है जिनके प्रयासों से यह यात्रा हर साल शांतिपूर्वक संपन्न होती है। इस बार तो राज्य सरकार की ओर से भी कांवड़ यात्रा के लिए अच्छे खासे प्रबंध किए गए थे। राज्य पुलिस और प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने खुद हेलिकाप्टरों के जरिए व्यवस्था का जायजा लिया जिसके लिए वे बधाई के पात्र हैं।

जहाँ इस कांवड़ यात्रा से करोड़ों लोग लाभान्वित हुए, वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों की तादाद भी अच्छी खासी है जिनके लिए सावन के ये दिन बहुत ही कष्टदायक रहे, खासकर शिवरात्रि से पहले के वे 4-5 दिन, जब गाज़ियाबाद से लेकर गंगोत्री तक का सारा रास्ता केवल कांवड़ यात्रियों के लिए ही रिजर्व कर दिया गया था। इस पूरे मार्ग पर पड़ने वाले तमाम शहरों में लगभग सभी कारखाने कुछ दिनों के लिए बंद कर दिए गए क्योंकि न तो उनके पास कच्चा माल मंगाने का कोई रास्ता था और न ही तैयार माल ग्राहकों तक पहचानें का कोई साधन। मार्ग बंद हो जाने के कारण न जाने कितने पर्यटकों को मज़बूरी में अपनी यात्रा लम्बी खींचनी पड़ी। बहुत सी बसें या तो बंद कर दी गईं या फिर उनके मार्ग में परिवर्तन कर दिया गया। जिससे एक घंटे में ख़त्म होने वाला सफ़र कई घंटों में ख़त्म हुआ और बढ़े किराये की मार पड़ी सो अलग।
हजारों ट्रक चालकों को अपनी यात्रा बीच में ही रोक कर ट्रक जहां-तहां खड़े करने पर मजबूर होना पड़ा। वह तो भला हो स्थानीय उद्यमियों का जिन्होंने जरूरतमंद ट्रक चालकों की आर्थिक रूप से मदद की, वरना बहुतों के पास तो खर्चे के पैसे तक ख़त्म हो गए थे। इसी तरह न जाने कितने लोग समय से न पहुँचने के कारण इंटरव्यू नहीं दे पाए तो बहुत से मरीजों को दिल्ली व गाज़ियाबाद के बड़े अस्पतालों तक पहुँचने के लिए भारी मशक्कत का सामना करना पड़ा।

इस कांवड़ यात्रा के दौरान बहुत कुछ ऐसा भी घटा जिनसे यदि हम सबक सीख लें तो शायद अगले साल हमें उतनी परेशानियाँ न झेलनी पड़ें। पुलिस और प्रशासन के अधिकारियों को चाहिए कि वे यात्रा के इन दिनों में अपने रोजमर्रा के कामकाज की अनदेखी न करें। हर दिन उनके ऑफिसों में हजारों लोग अपनी समस्या लेकर आते हैं लेकिन उन्हें ऑफिस में न पाकर मायूस होकर बैरंग लौट जाते हैं। इसी तरह मार्ग में लगाये जाने वाले सेवा शिविरों के संचालकों को ध्यान रखना चाहिए कि उनकी वजह से किसी को परेशानी न हो। कांवड़ यात्रियों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे अपनी यात्रा के दौरान दूसरों की परेशानियों का सबब न बने। बेहतर हो कि वे कांवड़ यात्रा के दौरान गंगा और अन्य नदियों की सफाई, वृक्षारोपण, स्त्री शिक्षा जैसे सामाजिक कामों का भी संकल्प लेकर अपनी यात्रा पूरी करें।

यह कहना तो बहुत मुश्किल होगा कि इस कांवड़ यात्रा से धर्म का ज्यादा भला हुआ या मानवता का, मगर इस कांवड़ यात्रा से दूसरे धर्मों के लोग यह सबक जरूर ले सकते हैं कि किस तरह धर्म की धारा में बहकर चलने वाले करोड़ों लोगों को अनुशासित भी रखा जा सकता है।

आपका अपना,
अनिल गुप्ता