ताज़ा खबर :
prev next

न लादें बच्चों पर बोझ अपनी महत्वाकांक्षाओं का

न लादें बच्चों पर बोझ अपनी महत्वाकांक्षाओं का

आज के आधुनिक परिवेश में देखा गया है कि आज का अभिभावक अपने बच्चों को प्रत्येक दूसरे बच्चे से आगे ले जाने की अंधी दौड में लगा हुआ है और अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिये खुद बच्चों की की भावनाओं की अनदेखी कर रहा है। और वह यह जानने की कोशिश नहीं करता कि बच्चा क्या चाहता है? इसकी क्या इच्छाएं है, उसकी रुचि किसमें है। फलस्वरूप आज के बच्चा हर पल सहमा सा एवं तनाव ग्रस्त रहने लगा है।

देखा गया है कि अधिकतर अभिभावक बच्चे का जन्म होते ही उसके लिये सपने देखना शुरु कर देते है और एक साल का होते-होते ही उसे अंग्रेजी के शब्द रटाना शुरु कर देते है, और उसके उस विकास को जो खेलकूद द्वारा ही हो सकता है रोक देते हैं। आज के समाज में पुस्तकीय ज्ञान को बच्चों के आंतरिक ज्ञान की अपेक्षा अधिक महत्व दिया जाता है। पहले यह कहा जाता था कि यदि संसार में पूर्ण तनाव मुक्त कोई होता है तो वह पाँच या छः साल का बच्चा। परन्तु मेरी नजर में आज दो साल का बच्चा भी तनाव में है, क्योंकि यदि वह बच्चा अपने माता-पिता के साथ कहीं जाता है तो उस पर दबाव डाला जाता है कि बेटा अमुक पोयम सुनाओ, अंकल को या ए, बी, सी, डी सुनाओ, अंकल को यदि वह सुनाने के मूड में नहीं होता है, तो उसे डांटा जाता है, कि उसने तो उनकी नाक कटा दी क्योंकि घर पर तो वह धड़ाधड़ पोयम सुना रहा था या अंग्रेजी के अनेक शब्द बोल रहा था।

आईआईटी अथवा मेडिकल सम्बन्धी उच्च शिक्षण संस्थाओं में पढ़ने का सपना देखने वाले छात्रों की जिंदगी में भी काफी तनाव देखा जा रहा है। कक्षा 9 में प्रवेश के साथ ही कोचिंग शुरु करा दी जाती है। छात्रों पर अभिभावकों की तरफ से बेहतर से बेहतर प्रदर्शन का दबाव होता है, और वे अपने वर्तमान प्रदर्शन से कभी संतुष्ट नहीं हो पाते और परीक्षा परिणाम मन मुताबिक न आने के कारण छात्र-छात्राएं आत्महत्या जैसा घातक कदम उठा लेते हैं।

इस लेख के माध्यम से मैं अभिभावकों से अपील करता हूँ कि बच्चों पर अपनी इच्छाएं न थोपें बल्कि यह जानने की कोशिश करें कि बच्चे की रुचि किसमें है, उसकी रुचि के अनुसार ही उसे शिक्षित करें, आधुनिकता एवं प्रति स्पर्धा के चक्कर में उसका सर्वांगीण विकास न रोकें। बच्चों को जीवन का भरपूर आनन्द उठाने दें। बच्चों को उनकी पसंद की पढ़ाई करने दें, पसंद का कैरियर चुनने और जीवन में चुनाव करने की आजादी दें। जिससे बच्चे स्वयं आत्मनिर्भर होंगे। अपने परिणाम के लिए स्वयं मानसिक तौर पर तैयार रहेंगे। खुशी-खुशी असफलताओं का सामना कर सकेंगे और हार को गले लगाकर एवं उससे सबक लेकर शनैः शनैः जिदंगी में आगे बढ़ना सीखेंगे।

मैं छात्र-छात्राओं से भी अपील करना चाहूँगा कि हमारा जीवन बहुत अनमोल है हमारे माता-पिता एवं समाज जिसमें हम रहते हैं उसके प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है उनका सम्मान करना हमारा परम कतव्र्य है। हमें जानना है कि जीवन में अगर सफलता है, तो असफलता भी है। हमें हमेशा याद रखना होगा कि जिन लोगों ने असफलता को देखा है, वे उन लोगों की तुलना में अधिक आत्मविश्वास से जीवन में आगे बढ़ते हैं, जिन्होंनें कभी असफलता का सामना नहीं किया।

अतः आपको सफलता के साथ-साथ असफलता का भी सामना एक चुनौती के रुप में करना होता है। इस लेख का अंत, मैं स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन की निम्न पंक्तियों से कर रहा हूँ, जो आपके लिए अत्यन्त लाभकारी होंगी।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

प्रद्युम्न जैन

(लेखक प्रबन्धक हैप्पी आवर्स स्कूल फॉर गर्ल्स, गोविंद पुरम के प्रबंधक है।)

(हमारा गाज़ियाबाद के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.) यदि आप व्हाट्स एप के माध्यम से गाज़ियाबाद की ख़बरें पाना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक कर आप हमारे ग्रुप्स से जुड़ सकते हैं. https://goo.gl/ho2rbI

By हमारा गाज़ियाबाद संवाददाता : Wednesday 25 अप्रैल, 2018 16:04 PM