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सीवेज, साईं उपवन और हमारी हिंडन

anil-jee-whatsappदिल्ली की यमुना से भी कहीं ज्यादा प्रदूषित है हमारे गाज़ियाबाद की हिंडन नदी। इसे नदी कहना भी नदियों की बेईज्जती करना होगा। नदी क्या नाले भी आपको इससे ज्यादा साफ़ मिल जायेंगे। औद्योगिक नगरी गाज़ियाबाद ने अपनी सारी गंदगी हिंडन को समर्पित करके विनाश का ऐसा मॉडल पेश किया है जिसकी चपेट में आने से आने वाली पीढ़ियाँ बच नहीं पाएंगी। ऊपर से प्रशासन की बदहाल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट योजना हर दिन हर क्षण हिंडन की मुसीबत बढ़ाती जा रही है। हालात ये हैं कि हिंडन नदी में ऑक्सीजन की मात्रा लगभग शून्य हो गई है।

हिंडन नदी में गंदगी के अलावा कुछ भी नहीं है। केवल रिसर्च करने लायक बची हिंडन नदी के प्रति प्रशासनिक उदासीनता हैरान करती है। हिंडन नदी पर हुए तमाम शोधों में साफ कहा गया है कि हिंडन नदी आज की तारीख में केवल सीवेज बहाने का नाला भर है। और इस गंदे नाले में पेस्टीसाइड के साथ रासायनिक तत्व भी मौजूद हैं। जिले की कई पेपर मिल, शुगर मिल, डिस्टलरी, केमिकल और डाइंग फैक्टरी के अपशिष्ट बिना ट्रीटमेंट के सीधे हिंडन में डाले जा रहे हैं। आम जनता, मीडिया और सरकारी अफसर सभी ने नदी को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी मूक दर्शक बना केवल नदी की मॉनिटरिंग ही कर पाता है। अफ़सोस कि कभी जीवनदायिनी कही जाने वाली नदी आज अपनी ही जिंदगी बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही है।

एक विडंबना और देखिये, इसी नदी के तट पर गाज़ियाबाद नगर निगम ने साईं उपवन नाम से एक बड़ा सा पार्क विकसित किया है। पार्क बनाते वक्त दलील दी गई थी कि शहर के बीचों-बीच प्राकृतिक हरियाली से भरपूर यह इलाका शहरवासियों के लिए स्वच्छ ऑक्सीजन का सहारा बनेगा। लेकिन अधिकारियों के ढीले रवैये और देख-रेख के आभाव से इस पार्क का हाल भी बगल में बहने वाली हिंडन नदी जैसा ही होता जा रहा है। पहले से ही बदहाल इस पार्क के बगल से गुजरने वाली सीवेज लाइन ने पार्क के बड़े भाग को अपने गंदे पानी की चपेट में ले लिया है।

सीवेज का बढ़ता प्रवाह ओवरफ्लो होकर साईं उपवन को बर्बाद कर रहा है। उद्यान में घूमकर मेरा खुद का अनुभव है कि यहाँ निगम की ओर से लगाये गये कई हजार पौधों को गंदा पानी लील चुका है। साथ ही पार्क की आबोहवा भी इस विषैले पानी से प्रदूषित हो चुकी है। इस इलाके में रहने वाली आबादी इन मरते पेड़ों से बेखबर हो ऐसा हो नहीं सकता। अपनी आबो हवा को लेकर लोगों की बेरुखी बहुत सालती है। इंसान इस कदर खुदगर्ज़ और गैर ज़िम्मेदार हो सकता है ये देखना बहुत पीड़ा देता है।

शहर की लाखों जिंदगियों के साथ इस खतरनाक खिलवाड़ के पीछे किसका हाथ है?  इस सवाल का ज़वाब खोजने के साथ लोगों की लापरवाही और बेरुखी का कारण भी खोजना ज़रूरी है। ये तो भला हो उन संस्थाओं का जिन्होंने गाज़ियाबाद में कई हज़ार पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा है। लेकिन शहर में खाली जगह को ढूंढते हुए जब ये संस्थायें हिंडन किनारे इस जगह पहुंचती हैं तो उन्हें यहाँ निगम की ओर से लगाये गये पौधों की दुर्दशा देख कर अपने उद्देश्य पर दोबारा सोचने को मजबूर होना पड़ता है। इसके बावजूद साईं उपवन के बर्बाद हुए पेड़ों की जगह भी नए पेड़ लगवाने के लिए कई संस्था के लोगों ने काम शुरू कर दिया है।

आम तौर पर नदी के किनारे लगे पेड़-पौधे खूब हरे भरे और स्वस्थ होते हैं पर अपने शहर में तो नदी को गन्दा नाला बना कर हमने उसके किनारे लगे सारे पेड़ों को मौत की नींद सुला दिया है। नदी नहीं बचेगी, पेड़-पौधे नहीं बचेंगे तो शायद गाज़ियाबाद भी नहीं बचेगा। ऐसे में मैं यही उम्मीद करता हूँ कि प्रशासन के साथ आम जनता भी पर्यावरण के संरक्षण के प्रति गंभीर होकर आगे आयें। नदी बचाएं, शहर बचाएं और साथ में अपना देश भी बचाएं।

आपका अपना,
अनिल कुमार

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Sunday 24 सितंबर, 2017 17:51 PM