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जानिए उन दवाइयों के बारे में जो विकसित देशों में प्रतिबंधित, पर भारत में बिकती हैं धड़ल्ले से

जानिए उन दवाइयों के बारे में जो विकसित देशों में प्रतिबंधित, पर भारत में बिकती हैं धड़ल्ले से

गाज़ियाबाद | क्या आप जानते हैं कि सर्दी जुकाम के लिए किसी भी मेडिकल स्टोर पर आसानी से मिलने वाली विक्स वेपोरब, विक्स एक्शन 500 और कॉम्बीफ्लेम जैसी अनेक दवाइयाँ विकसित देशों में प्रतिबंधित हैं? ऐसा कैसे संभव है कि एक दवाई अमेरिका, जर्मनी या यूरोप के निवासियों के लिए तो हानिकारक है लेकिन भारतीय या अफ्रीकी नागरिकों के लिए नहीं?

हालांकि ऐसा नहीं है कि भारत में सरकार आमजन के स्वास्थ्य से जुड़े इस महत्वपूर्ण मसले पर चिंतित नहीं है। लेकिन न्याय व्यवस्था में होती देरी के कारण यह मसला कानूनी पचड़ों में फंस कर रह गया है और जनता की जिंदगी से खुलेआम खिलवाड़ हो रहा है। आपको बता दें कि मार्च 2016 में केंद्र सरकार ने 344 दवाइयों पर बैन लगाया था। इस फैसले के खिलाफ देश कि प्रमुख दवा निर्माता कंपनियां अदालत जा पहुंचीं तो दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिसंबर 2016 में यह बैन हटा दिया। फिलहाल यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और संभव है कि ऐसी खतरनाक दवाइयों पर आने वाले समय में उस पर बैन लगा दिया जाए।

ताज़ा मामले में इंग्लैंड की सरकार स्वास्थ्य सेवा संस्था (एनएचएस) ने जिन ग्रेसबी सिरिन्ज ड्राइवर्स के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया है। जबकि ये ड्राईवर भारत के सरकारी अस्पतालों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। दरअसल जब इंग्लैंड के प्रमुख अखबार “द संडे टाइम्स” ने जब द संडे टाइम्स ने ग्रेसबी सिरिंज ड्राइवर्स से होने वाले नुकसान का खुलासा किया था तो उन्हें एनजीएस ने एक नोटिस जारी कर दिया जिसमें कि ग्रेसबी एमएस 16 और एमएस 26 सिरिंज ड्राइवर्स को रिप्लेस किया जाएगा। दिसंबर 2011 में जारी इस नोटिस में यह भी कहा था कि इन सिरिंज ड्राइवर्स को तीसरे देशों को दान में दे दिया जाएगा। इसके बाद यूके रोटरी क्लब ने 2011 में एक प्रोजेक्ट ऑर्गेनाइज किया था, जिसके तहत 100 से भी अधिक सिरिंज ड्राइवर दक्षिण अफ्रीका भेजे गए थे।

सूत्रों के अनुसार विदेशों से दान के रूप में मिले इन ग्रेसबी सिरिन्ज ड्राइवर्स का भारत और नेपाल समेत अनेक देशों में धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत सरकार को इन खतरनाक ग्रेसबी सिरिन्ज ड्राइवर्स और अन्य हानिकारक दवाइयों के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगानी चाहिए या नहीं, और यदि हाँ तो अभी तक किस बात का इंतज़ार हो रहा है? आश्चर्य की बात है कि इस मुद्दे पर अधिकतर भारतीय डॉक्टर्स भी शांत बैठे हैं।

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