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हमारा गाज़ियाबाद – जहां अतिक्रमण हटता भी है तो सिर्फ चंद घंटों के लिए

हमारा गाज़ियाबाद – जहां अतिक्रमण हटता भी है तो सिर्फ चंद घंटों के लिए

गाज़ियाबाद | भारत के अन्य महानगरों की तरह ही गाजियाबाद में भी अतिक्रमण एक गंभीर समस्या बन चुका है। लेकिन विभागीय भ्रष्टाचार, भू-माफिया, नेताओं का वोट बैंक से प्यार, जनता का धार्मिक उन्माद, लोगों का गांवों से शहरों की ओर पलायन और बढ़ती बेरोजगारी आदि ऐसे बहुत से कारण है जिसकी वजह से इस गंभीर समस्या पर सर्वोच्च न्यायालय तक लाचार नज़र आ रहा है। अभी हाल ही में हिमाचल प्रदेश के कसौली में विजय ठाकुर नाम के एक होटल व्यापारी ने वहाँ की सहायक टाउन प्लानर शैल बाला शर्मा की सरेआम गोली मार कर हत्या कर दी। शैल बाला का दोष सिर्फ इतना ही था कि वे सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर होटल मालिक द्वारा किए गए अतिक्रमण को ध्वस्त करवा रहीं थी।
अगर हम अपने गाज़ियाबाद की बात करें तो यहाँ के कुर्सी और आराम पसंद अधिकारी भी कभी-कभार अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाते हैं। अब ये बात अलग है कि इन अभियानों की असली वजह कीमती सरकारी जमीन को खाली कराना नहीं बल्कि अदालत से अपनी कुर्सी बचाना ज्यादा होती है। लेकिन जैसे ही अतिक्रमण हटाओ अभियान चलता है, इलाके के पार्षदों से लेकर सांसद तक अतिक्रमण करने वालों के साथ खड़े हो जाते हैं। जिले के भू-माफिया की बात करें तो वह लगातार मिलते राजनैतिक संरक्षण और भ्रष्ट अधिकारियों के बल पर इतना ताकतवर हो चुका है कि बड़े से बड़े अधिकारी का तुरंत ट्रान्सफर कराने में सक्षम है। यह भी सर्वविदित है कि यदि गांठ में पैसा हो तो अदालतों से स्टे ऑर्डर स्टेशन पर चाय-कॉफी की तरह मिलते हैं। यही कारण है कि अदालती आदेशों के बावजूद अतिक्रमण करने वाले पुनः जमीन पर कब्जा कर लेते हैं। राज नगर, वसुंधरा, वैशाली, इंदिरापुरम और शहर के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्र आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है जहां अतिक्रमण हटाओ अभियान चलने के अगले ही दिन बाद ही ज़मीनों पर फिर से कब्जा हो गया।
अदालतें भी केवल अतिक्रमण हटाने के आदेश पारित करती हैं लेकिन कभी उन अधिकारियों के विरुद्ध कभी कार्यवाही करने का आदेश नहीं देती जिनके कार्यकाल में अतिक्रमण हुआ है। अच्छा तो यह होता कि दूरगामी और व्यावहारिक नीतियाँ बनाकर अतिक्रमण को स्थायी रूप से हटवाया जाए। स्थानीय पुलिस अधिकारियों को इतना सशक्त किया जाए कि पार्षद और वोट के भूखे नेता अपने वोट बैंक से किसी प्रकार का अतिक्रमण न करवा पाएँ। इसी के साथ भू-माफिया को संरक्षण देने वाले नेताओं पर अंकुश लगाने के लिए भी ठोस कदम उठाए जाएँ। संचार क्रांति के इस युग में यह करना कुछ ज्यादा मुश्किल भी नहीं है।

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