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पार्किंग अब बन चुकी है जी का जंजाल

पार्किंग अब बन चुकी है जी का जंजाल

अभी हाल ही में दिल्ली की एक पॉश कॉलोनी में पार्किंग को लेकर दो भाइयों के बीच लड़ाई इतनी बढ़ी कि परिवार के तीन लोगों की जान चली गयी। आज शहरों के भीतर सड़कों की चौड़ाई कम हो रही है गाडियाँ बढ़ रही हैं। अब तो सड़क पर साइकिल चलाने के लिए भी बड़े जिगर की जरूरत है क्योंकि सड़क का ज़्यादातर हिस्सा तो गाड़ियों की पार्किंग में चला जाता है। पैदल यात्री भी कहाँ चले, फुटपाथ पर दुकानदारों के अतिक्रमण से बची जगह का इस्तेमाल दुपहिया वाहनों की पार्किंग के तौर पर होता है।
ज़मीनों की कीमत इतनी बढ़ चुकी है कि दुकान, दफ्तर, शॉपिंग मॉल, मकान या बारात घर बनाते समय पार्किंग के बारे में कोई सोचता ही नहीं। सरकारी अफसर पैसा खा-खा कर नक़्शे पास कर देते हैं और बिल्डर पार्किंग की जगह पर प्लाट काट देते हैं। इन्हें कोई सज़ा भी नहीं मिलती, क्योंकि रिश्वत का पैसा ऊपर से नीचे सब मिलकर खाते हैं। और हम पब्लिक भी ऐसे रिश्वतखोर अफसरों और सरकारों के खिलाफ कुछ नहीं करती। चुनाव से पहले भ्रष्टाचार भले ही चर्चा में रहे मगर उम्मीदवार की जाति और अपनी पसंदीदा पार्टी के सामने रिश्वतखोरी को हम भूल ही जाते हैं। हम पूछते ही नहीं कि प्रदेश के मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक , पार्षद और उन के रिश्तेदार पांच दस सालों में ही रोड पति से करोड़ पति कैसे बन जाते हैं।
शहर के प्राइवेट अस्पतालों के नक़्शे पास कराते समय तक तो पार्किंग की पूरी व्यवस्था दिखाई जाती है, पर अस्पताल बनते-बनते पार्किंग की जगह वार्ड और कैंटीन बना दिए जाते हैं। मजबूरी में लोग पार्किंग के लिए सरकारी सड़क और आस-पड़ोस के घरों के सामने की जगह का ही प्रयोग करते हैं। निजी अस्पताल मालिकों से पंगा लेने की कोशिश आजकल कोई नहीं करता। आदमी सोच कर ही डर जाता है कि ना जाने कब हमें ही इमरजेंसी में अस्पताल की सेवाओं की जरूरत पढ़ जाए। इस के अलावा कई अस्पतालों ने तो बाउंसर भी रखे हुए हैं और उनकी पुलिस से लेकर प्रशासन तक हर विभाग में गहरी पैठ भी होती है।
पार्किंग की परेशानी के लिए शहर की कई मार्केट भी बदनाम हैं। यहाँ शाम से लेकर देर रात तक जाम जैसी स्थिति रहती है और यहाँ आने वाला हर आदमी अपने आप को किसी बादशाह से कम नहीं समझता। हर आदमी दुकान या रेस्टोरेंट के सामने ही गाड़ी खड़ी कर शॉपिंग करना चाहता है। गाड़ी में बैठे-बैठे ही खाने का सामान ऑर्डर करना और फिर गाड़ी में ही बैठ कर उसे खाने की अपनी अलग ही शान है। और हाँ गाज़ियाबाद में तो पुलिस से डरने की भी जरूरत नहीं है क्योंकि पुलिस को यहाँ के दुकानदार खुश रखते हैं और दुकानदारों को यहाँ आने वाले ग्राहकों से ख़ुशी मिल ही जाती है।
वैसे पार्किंग का रोना रोने वाले हम लोग भी दूध के धुले नहीं हैं। हर दूसरा आदमी अपने घर के बाहर की सार्वजनिक जगह को अपने पिता की संपत्ति समझ कर उस पर अपना जेनेरेटर रख देता हैं या सरकारी जमीन की फेंसिंग करा बागवानी का शौक पूरा करता है। ऐसे में घर आने वाले मेहमान अपनी गाड़ियां सड़क पर खड़ी करते हैं या फिर किसी ऐसे भले आदमी के घर के सामने खड़ी करते हैं जिसने घर के बाहर फेंसिंग नहीं कर रखी होती है। कुल मिलाकर गाड़ियों की सड़क पर पार्किंग होने के पाप में हम आम आदमी भी बराबर के ज़िम्मेदार हैं।
वैसे पार्किंग की समस्या को आज तक कभी किसी ने गंभीरता से लिया ही नहीं। शहर की आम जनता परेशान तो रहती है पर इस के लिए कभी किसी एमपी या एमएलए से कोई मांग नहीं करती। हम आमजन भी अपनी आदतें देखने और बदलने के लिए तैयार नहीं है। सरकारी अफसर या तो और ज़्यादा अर्जेंट कामों में बिजी रहते हैं या फिर उन्हें रिश्वत खिलाकर उनका मुंह बंद कर दिया जाता है। आज के जन प्रतिनिधि तो नेता कम और भीड़ के पिछलग्गू ज़्यादा होते हैं। ये लोग वो करते हैं जिसके करने से उन्हें वोट मिलें इसलिए जनता जो चाहे वह होने देते हैं ये लोग। अपने आप इन्हें कुछ गलत नहीं लगता और विवेक की तो इनसे उम्मीद रखना भी बचपना ही कहलायेगा आज के दिन।
ऐसी स्थिति में आप को क्या लगता है? क्या शुरुआत अपने आप और अपनी आदतों से करनी ठीक नहीं रहेगी? क्या हम लोगों के बदल जाने से बहुत कुछ नहीं बदल जाएगा? क्या हम और आप जब पार्किंग जैसे बुनियादी मुद्दे को चुनावी मुद्दा बनायेंगे तो पार्किंग की समस्या के समाधान में मदद नहीं मिलेगी ? बात बहुत छोटी दिखती है पर है बहुत बड़ी। इस से पहले कि पार्किंग के मुद्दे पर घर-घर में सर फूटने लगें हमें ही कुछ करना ही होगा।
आपका अपना
अनिल गुप्ता

By अनिल कुमार (पब्लिशर व एडिटर-इन-चीफ) : Saturday 21 जुलाई, 2018 19:23 PM