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बाल कट कर लोगों की जिंदगी बदल रहे हैं गोरखपुर के आजाद पांडेय

बाल कट कर लोगों की जिंदगी बदल रहे हैं गोरखपुर के आजाद पांडेय

गाज़ियाबाद | हम लोग अकसर सड़क के किनारे मैले कुचैले, बढ़े हुए बाल वाले व्यक्तियों को पागल समझने की गलती कर बैठते हैं। ऐसे लोगों को हम अपने पास आते देखकर कई बार उन्हें दुत्कार कर भगा भी देते हैं। मगर गोरखपुर के रहने वाले आजाद पांडेय उनके साथ बैठते हैं, उनसे हंसी-ठ‍िठोली करते हैं और उनके द‍िल की बातें सुनते हैं। आजाद ऐसा इसल‍िए करते हैं कि इन लोगों की जिंदगी संवार सकें। लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी और इलाहाबाद की सड़कों पर गुमनामी के अंधेरे में खो गए ऐसे लोगों की सूरत और सीरत बदलने के ल‍िए वह अपने साथ हमेशा एक उस्‍तरा रखते हैं। उनका मकसद है ‘पागलों’ का ‘इंसानों’ से र‍िश्‍ता जुड़ सके।

आजाद पांडेय कहीं भी निकलते हैं, अपने बैग में उस्‍तरा और कुछ कपड़े जरूर रखते हैं। उनका सामना अक्‍सर ही ऐसे लोगों से होता है इसके बाद तो उस इंसान के बाल काटने से लेकर उनको नहलाने का काम शुरू होता है। पागलों को इंसान बनाने के ल‍िए सबसे पहले वह उनके बाल काटते हैं। यह काम किसी नाई से नहीं कराते, बल्कि खुद करते हैं।

आजाद पांडेय ने बताया कि जब उन्‍हें सड़कों पर धूल-म‍िट्टी से सने लोग म‍िलते थे तो उनका हुल‍िया सुधारने के ल‍िए बड़ी समस्‍या आती थी। कोई नाई उनके बाल काटने का राजी नहीं होता था। इस परेशानी से उबरने के ल‍िए मैंने खुद ही बाल काटना सीखा ल‍िया और अब तो मैं उस्‍तरा साथ लेकर चलता हूं। आजाद ने बताया कि अक्‍सर लोग सड़कों पर घूमने वाले लोगों को पागल समझ बैठते हैं मगर वह हकीकत में पागल नहीं होते। उनमें से अधिकतर घर से झगड़कर तो कभी कोई इलाज कराने पर‍िजनों के साथ दूसरे शहर आते हैं लेकिन हालात उन्‍हें सड़कों पर घूमने को मजबूर कर देते हैं। आजाद बताते हैं कि उन्‍होंने सड़कों पर घूमते हुए ऐसे कई लोगों से बातचीत की तो पता चला क‍ि पर‍िजन उनका इलाज कराने लाए मगर बाद में छोड़कर चले गए। वहीं कई ऐसे भी म‍िले जो अपने पर‍िजनों से नाराज थे और उनका ठ‍िकाना सड़क बन गया।

आजाद ने बताया कि तकरीबन 1,000 से अध‍िक ऐसे लोगों से वह सड़कों पर म‍िल चुके हैं। कई लोगों को उन्‍होंने घर पहुंचाया तो कई ऐसे भी हैं ज‍िन्‍हें जीवन जीना स‍िखाया। वह गुमनामी में खो चुके लोगों की काउंसल‍िंग करने के बाद उनके परिजनों से संपर्क करते हैं। पर‍िवार की सहमत‍ि पर ऐसे लोगों को उनके घर छोड़ द‍िया जाता है। वर्तमान में आजाद के घर में ऐसे ही दो मानस‍िक रोगी रह रहे हैं ज‍िन्‍हें उनके पर‍िजनों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। यही नहीं, आजाद पांडेय भीख मांगने वाले बच्‍चों के ल‍िए स्‍माइल बैंक भी चलाते हैं। इस बैंक के जर‍िए वह रेलवे स्‍टेशन और सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्‍चों को पढ़ाते हैं। उनका लक्ष्‍य है प्रदेश से बाल भ‍िक्षा खत्‍म हो।

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