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मासूमों से दरिंदगी आखिर कब तक.. ?

मासूमों से दरिंदगी आखिर कब तक.. ?

गाज़ियाबाद। 8 साल की बच्ची को अगवा कर मंदिर में सामूहिक बलात्कार किया जाता है , उसकी नृशंस ह्त्या कर दी जाती है और ये सब वहां रह रहे अल्पसंख्यक समुदाय को वहां से भगाने की साजिश के तहत किया जाता है। इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली इस घटना की शिकार मासूम बच्ची के लिए इन्साफ मांगने के बजाय कुछ बेशर्म लोग अपराधियों को बचाने के लिए सड़कों पर उतरे हुए हैं। ये लोग खुद को हिन्दुओं और हिन्दू अधिकारों का रक्षक बताते फिर रहे हैं। देश के दूसरे हिस्सों में भी इस जघन्य और बर्बर काण्ड के लिए जैसा शोर मचना चाहिए था वो नहीं हो रहा। केवल जम्मू-कश्मीर में ही इस दरिंदगी के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है।

एक बॉलीवुड स्टार को हिरासत में लिया जाता है तो पूरे देश में इसकी चर्चा होती है, और लोग बेसब्री से उसके बरी होने का इंतजार करते हैं। लेकिन आज जब 8 साल की बच्ची से रेप का मामला सामने आया है तो सभी शांत हैं। शुरुआत में मीडिया ने भी इस खबर को कोई ख़ास तबज्जो नहीं दी। 8 साल की बच्ची का सामूहिक बलात्कार और नृशंस ह्त्या का सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय ना बनना  शायद हम लोगों की मरती हुई संवेदना का प्रमाण है। दूर घटने वाली घटना से हमने जुड़ना बंद कर दिया है। ऐसा हादसा यदि एन सी आर में हुआ होता तो हम कुछ करते।

एक तरह से सोचा जाए तो इस बच्ची के बलात्कार और ह्त्या के दोषी हम सभी हैं। हमारा मीडिया आज एक तरफ़ा और प्रायोजित ख़बरें देता है और हम उस पर आँख मूँद के विशवास करने लग जाते हैं. हम धर्म और जाति के चश्मों से दुनिया देखते हैं। हम पुजारियों, ग्रंथियों और मौलवियों को अपनी जिंदगी की दिशा तय करने देते हैं। ये बोलते हैं और हम मान लेते हैं। हम धर्म की मानने के बजाये धर्म को मानने लग गए हैं। धर्म को हम एक छतरी के रूप में इस्तेमाल करते हैं जिस के नीचे खड़े रहकर हम खुद को दूसरे धर्मों के लोगों से महफूज़ समझते हैं। इस बच्ची के बलात्कार और ह्त्या के पीछे भी धर्म और धर्म के ठेकेदार हैं और जुर्म के विरोध में ना बोलने की मानसिकता भी धार्मिक अलगाव से ही आयी है।

अगर धर्म और नफरत के चश्मे उतारकर लोग बच्ची की माँ या बाप बनकर उनकी फीलिंग्स को महसूस करें तब घटना की भयावहता से उनका दिल दहल जाएगा। बच्ची के शरीर को नोचे खसोटे जाने का दर्द तभी महसूस किया जा सकता है जब 8 साल की बच्ची के निश्छल मन और नाजुक शरीर के बारे में सोचा जाए। अपराध अपराध होता है और उस को उसी नज़रिए से ही देखा जाना चाहिए। जिस समाज में नारी का सम्मान नहीं होता उसको समाज कहना ही गलत होगा। अपने बच्चों से अच्छे आचरण की उम्मीद तब तक बेमानी है जब तक हम खुद एक इंसान नहीं बन जाते। बच्ची को न्याय मिले और ऐसी कोई घटना फिर कभी ना घटे इस के लिए हमें आवाज़ उठानी होगी। अब चुप रहे तो फिर बहुत देर हो जायेगी।

 

 

 

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