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1984 सिख दंगा: हाईकोर्ट ने कांग्रेस नेता कमलनाथ के खिलाफ मांगा SIT से जवाब

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ की 1984 के सिख दंगों के मामले में मुश्किलें बढ़ सकती हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने गुरुवार को विशेष जांच दल (SIT) को 1984 के सिख विरोधी दंगे से जुड़े एक मामले में कांग्रेस नेता कमलनाथ की कथित भूमिका की जांच की मांग संबंधी एक अर्जी पर स्थिति रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद ने बीजेपी के मनजिंदर सिंह सिरसा की याचिका पर एसआईटी को नोटिस जारी किया और मामले की अगली सुनवाई की तारीख 28 मार्च तय की। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसका गठन किया था।

सिरसा ने उच्च न्यायालय में दायर की गयी अपनी याचिका में अदालत से अनुरोध किया है कि वह एसआईटी को पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में 1984 में दर्ज की गयी प्राथमिकी में कमलनाथ के विरूद्ध कार्रवाई करने का निर्देश दे, इस मामले में पांच व्यक्तियों को बतौर आरोपी नामजद किया गया था और उन्हें कथित रूप से कांग्रेस नेता के घर पर ठहराया गया था।

इन आरोपियों को सबूत के अभाव में बरी कर दिया गया। हालांकि कमलनाथ को प्राथमिकी में कभी नामजद नहीं किया गया। सिरसा ने अपनी याचिका में अदालत से अनुरोध किया है कि वह कमलनाथ को अविलंब गिरफ्तार करने का निर्देश दे। सिरसा का पक्ष अदालत में वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह और वकील गुरबख्श सिंह ने रखा।

यह मामला यहां गुरद्वारा रकाब गंज में दंगाइयों द्वारा हमला से जुड़ा है। कमलनाथ ने आरोपों से इनकार किया था। एसआईटी ने सितंबर 2019 में सात सिख विरोध दंगा मामलों को फिर से खोलने का फैसला किया था जहां आरोपी या तो बरी कर दिये गये या सुनवाई बंद कर दी गई। अधिसूचना सार्वजनिक होने के बाद सिरसा ने दावा किया कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने कथित रूप से उन पांच लोगों को शरण दिया था जो सात मामलों में एक में आरोपी है।

सिख दंगों के मामले में कांग्रेस के एक नेता सज्जन कुमार को पहले ही उम्र कैद की सजा हो चुकी है। सिरसा का आरोप है कि कांग्रेस पार्टी साल 2014 तक सिख दंगों के आरोपी सज्जन कुमार, जगदीश टाइटलर और कमलनाथ को बचाती रही क्योंकि इनकी गिरफ्तारी से 1984 के नरसंहार में गांधी परिवार की भूमिका का खुलासा हो सकता था। 2014 के बाद केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद सिखों को न्याय दिलाने की असली लड़ाई शुरू हुई।

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