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संविधान दिवस: विपक्ष के बहिष्कार पर पीएम मोदी का पलटवार, जमकर सुनाई खरी खोटी

नई दिल्ली। संविधान दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सेंट्रल हॉल में अपना संबोधन दिया। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत राष्ट्रपित महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हुए की। इस मौके पर उन्होंने विपक्षी पार्टी के शामिल नहीं होने पर पलटवार किया। उन्होंने कहा कि यह विरोध आज से नहीं हो रहा है। बाबा साहब आंबेडकर का नाम और आपने मन में यह भाव उठे, देश यह सुनने के लिए तैयार नहीं है। अब भी बड़ा दिल रखकर खुले मन से बाबा साहब का पुण्य स्मरण के लिए तैयार न होना, चिंता का विषय है।

पीएम मोदी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर नमन किया। उन्होंने कहा कि इस संविधान दिवस को इसलिए भी मनाना चाहिए क्योंकि हमारा रास्ता सही है या नहीं है, इसका मूल्यांकन हो सके। पीएम ने कहा कि हमारा संविधान ये सिर्फ अनेक धाराओं का संग्रह नहीं है, हमारा संविधान सहस्त्रों वर्ष की महान परंपरा, अखंड धारा उस धारा की आधुनिक अभिव्यक्ति है। पीएम मोदी ने कहा कि इस संविधान दिवस को इसलिए भी मनाना चाहिए, क्योंकि हमारा जो रास्ता है, वह सही है या नहीं है, इसका मूल्यांकन करने के लिए मनाना चाहिए। पीएम मोदी ने कहा कि बाबासाहेब अम्बेडकर की 125वीं जयंती थी, हम सबको लगा इससे बड़ा पवित्र अवसर क्या हो सकता है कि बाबासाहेब अम्बेडकर ने जो इस देश को जो नजराना दिया है, उसको हम हमेशा एक स्मृति ग्रंथ के रूप में याद करते रहें।

संविधान दिवस के मौके पर इस कार्यक्रम से कांग्रेस कांग्रेस के अलावा टीएमसी, राजद, डीएमके, सीपीआई और सीपीआई-एम भी हिस्सा नहीं लिया। पीएम ने विपक्षी दलों पर बरसते हुए कहा कि आज संविधान की भावना को चोट पहुंची है। संविधान की एक-एक धारा को भी चोट पहुंची है, जब राजनीतिक दल अपने आप में अपना लोकतांत्रिक कैरक्टर खो देते हैं। जो दल स्वयं में लोकतांत्रिक कैरक्टर खो चुके हों, वह लोकतंत्र की रक्षा कैसे कर सकते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि आज देश में कश्मीर से कन्याकुमार.. हिंदुस्तान के हर कोने में जाइए, भारत ऐसे संकट की तरफ बढ़ रहा है, जो संविधान को समर्पित लोगों के लिए चिंता का विषय है। लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वालों के लिए चिंता का विषय है। और वह है पारिवारिक पार्टियां।

राजनीतिक दल पार्टी फॉर द फैमिली, पार्टी बाय द फैमिली.. और आगे कहने की जरूरत मुझे नहीं लगती है। जब मैं कहता हूं पारिवारिक पार्टियां। इसका मतलब मैं यह नहीं कहता हूं कि एक परिवार से एक से ज्यादा लोग राजनीति में न आएं.. योग्यता के आधार पर.. जनता के आशीर्वाद से.. किसी परिवार से एक से अधिक लोग राजनीति में जाएं.. इससे पार्टी परिवारवादी नहीं बन जाती है। लेकिन जो पार्टी पीढ़ी दर पीढ़ी एक परिवार चलाता रहे। पार्टी की सारी व्यवस्था परिवारों के पास रहे, वह लोकतंत्र स्वस्थ लोकतंत्र के लिए संकट होता है।

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